आनंद का चिंतन करना अदभुत है, मंगलकारी है . आनंद का एक एक पद, एक एक शब्द,
एक एक अक्षर मधुरातिमधुर है. आप सुधिजनों ने मेरी पोस्ट 'रामजन्म - आध्यात्मिक चिंतन- १'
व 'रामजन्मआध्यात्मिक चिंतन- २' पर जो टिप्पणियाँ कीं उनमें आनंद ही आनंद समाया है ,
जिससे मन आनंद निमग्न हों गया है. और विशाल भाई के इन उद्गारों ने " सत आनंद ,
चित आनंद, असीम आनंद,बोध स्वरूपानंद ,ज्ञान स्वरूपानंद,अनिर्वचनीय आनंद,अचिन्त्य आनंद,
अपरिमेय आनंद,आनंदमय आनंद, बस आनंद ही आनंद." ने तो मानो आनंद की बरसात ही
कर दी है.
आईये चलिये आनंद की इसी तरंग में ही अब आगे बढते हैं. राम, दशरथ, कौशल्या, युगों का
तात्विक चिंतन कर लेने के पश्चात अब 'अवधपुरी' या 'अयोध्यापुरी' का तत्व चिंतन करने का
प्रयास करते हैं. गोस्वामी तुलसीदास जी रामचरितमानस में लिखते हैं:-
नौमि भौम वार मधुमासा, अवधपुरी यह चरित प्रकासा
बंदउ अवधपुरी अति पावनि, सरजू सरि कलि कलुष नसावनि
अवधपुरी का शाब्दिक अर्थ है ऐसी पुरी जहाँ कोई वध न हो. इसी प्रकार इसका पर्यायवाची
अयोध्यापुरी का भी अर्थ हैं ऐसी पुरी जहाँ कोई युद्ध न हो. श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय ५, श्लोक १३)
के अनुसार 'नवद्वारे पुरे देही' कहकर इस नौ छिद्रों वाले शरीर को ही नवद्वार रुपी पुरी
बतलाया गया है जिसमें जीव यानि 'देही' का निवास है.
अपने अपने दृष्टिकोण,भावों और विचारों से हम अपने ही अंदर 'अवधपुरी' या 'लंका पुरी' की
स्थापना कर लेतें हैं. यदि हम स्वयं को शरीर मानकर अपने ही अहंकाररुपी रावण के साम्राज्य
में आसुरी सम्पदा ईर्ष्या, द्वेष,चिंता, दुराशा,दंभ आदि को लेकर जीते हैं तो लंकापुरी की स्थापना
हो जाती हैं.परन्तु, अवधपुरी की स्थापना के लिए अपने को शरीर मानना छोड़ हमें सद्विवेक का
अनुसरण कर 'आत्मज्ञान' की आवश्यकता है.
हमारे शास्त्रों में शरीर को आत्मा का एक आवरण मात्र बताया गया है. मै जब अपने
को शरीर मानता हूँ तो उसका 'वध' अथवा मरण अवश्यम्भावी है.जिस कारण मृत्यु भय
मुझे सताने लगता है.मृत्यु भय के रहते हृदय में 'रामजन्म' यानि चिर स्थाई आनंद का उदय
होना सम्भव ही नहीं है मृत्यु भय के कारण ही मै जीवन में तरह तरह की कुचेष्टायें करता हूँ.
समस्त भ्रष्ट आचरण की जननी ऐसी कुचेष्टाएं ही हैं .परन्तु , जब मै स्वयं को
'सत्-चित-आनंद' परमात्मा का अंश 'आत्मा' मानता हूँ तो आत्मा के अवध होने के कारण मुझे
यह समझ आ जाता है कि मेरी मृत्यु किसी भी प्रकार से भी सम्भव नहीं है. मै मृत्यु के
भय से निजात पा अपने ही स्वरुप 'आनंद' का निर्बाध रूप से चिंतन व अनुभव करने में
समर्थ हो जाता हूँ. श्रीमद्भगवद्गीता में आत्मा के बारे में कहा गया है :-
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत:
अर्थात इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, आग जला नहीं सकती,जल गला नहीं सकता,
और वायु सुखा नहीं सकती.
आत्मा का स्वरुप अजर है, अमर है,नित्य है, 'सत्-चित-आनंद' है, अवध है, अर्थात आत्मा का
'वध' कभी भी सम्भव नहीं है जब इन भावों और विचारों का विवेकपूर्ण पोषण कर मै अपने
हृदय में गहन चिंतन द्वारा अच्छी प्रकार से स्थापित कर लेता हूँ तभी मेरे हृदय में 'अवधपुरी'
स्थापित होने लगती है. मृत्यु का डर मेरे हृदय से निकल जाता है , हृदय शांत हो जाता है.
मेरे विचारों और भावों में भी कोई किसी प्रकार का संघर्ष या युद्ध नहीं रह जाता , इसीलिए
अवधपुरी को 'अयोध्यापुरी' भी कहा गया है. ऐसी अयोध्या या अवधपुरी में ही राम यानि
'सत्-चित-आनंद' का जन्म नवमी तिथि, दिन मंगलवार (भौम) और मधुमास यानि बसंत ऋतु
में होता है.
नवमी तिथि,मंगलवार और मधुमास हृदय की उन स्थिति का सूचक हैं जब आत्मज्ञान की
साधना ,अभ्यास और उपवास परिपक्वता को प्राप्त हो,और हृदय में मंगल व उल्लास का सर्वत्र
संचार हो जाये. 'उपवास' का अर्थ केवल कुछ खाना पीना छोडना मात्र नहीं ,बल्कि
मन बुद्धि के साथ राम के निकट जप, ध्यान और उपासना के द्वारा वास करना है .
'सत्-चित-आनंद' का भाव तब विभिन्न रंगों से मन को सदा सराबोर किये रखता है और
मन सहज ही गा उठता है :-
होली खेले रघुबीरा, अवध में होली खेले रघुबीरा
ऐसी पावन अवधपुरी को हमारा शत शत नमन है, जिसमें आत्मज्ञान रूपी 'सरजू' नदी सदा
प्रवाहित होती रहती है, जो 'कलियुग' की कलुषता का हृदय से नाश करती है और जिसमें
राम का जन्म होकर राम चरित्र का प्रकाश हो पाता है. अफ़सोस! ऐसे विकार रहित प्रभु
के हृदय में रहते भी जगत के सब जीव दीन और दुःखी है, नाम का निरूपण करके नाम
का यत्न पूर्वक जप रुपी साधन करने से वही राम ऐसे प्रकट हो जाता है जैसे रत्न के
जानने से उसका मूल्य. इसीलिए गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं :-
अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी , सकल जीव जग दीन दुखारी
नाम निरूपन नाम जतन ते , सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें
राम, दशरथ व कौशल्या के बारे में मेरी पोस्ट 'रामजन्म-आध्यात्मिक चिंतन-१' तथा चारो
युगों (सतयुग,द्वापर ,त्रेता एवम कलियुग) के बारे में मेरी पिछली पोस्ट
'रामजन्म-आध्यात्मिक चिंतन-२' में प्रकाश डाला गया है.जो सुधिजन चाहें वे इन पोस्टों
का अवलोकन कर अपने सुविचार प्रकट कर आनंद की वृष्टि कर सकते हैं.
एक एक अक्षर मधुरातिमधुर है. आप सुधिजनों ने मेरी पोस्ट 'रामजन्म - आध्यात्मिक चिंतन- १'
व 'रामजन्मआध्यात्मिक चिंतन- २' पर जो टिप्पणियाँ कीं उनमें आनंद ही आनंद समाया है ,
जिससे मन आनंद निमग्न हों गया है. और विशाल भाई के इन उद्गारों ने " सत आनंद ,
चित आनंद, असीम आनंद,बोध स्वरूपानंद ,ज्ञान स्वरूपानंद,अनिर्वचनीय आनंद,अचिन्त्य आनंद,
अपरिमेय आनंद,आनंदमय आनंद, बस आनंद ही आनंद." ने तो मानो आनंद की बरसात ही
कर दी है.
आईये चलिये आनंद की इसी तरंग में ही अब आगे बढते हैं. राम, दशरथ, कौशल्या, युगों का
तात्विक चिंतन कर लेने के पश्चात अब 'अवधपुरी' या 'अयोध्यापुरी' का तत्व चिंतन करने का
प्रयास करते हैं. गोस्वामी तुलसीदास जी रामचरितमानस में लिखते हैं:-
नौमि भौम वार मधुमासा, अवधपुरी यह चरित प्रकासा
बंदउ अवधपुरी अति पावनि, सरजू सरि कलि कलुष नसावनि
अवधपुरी का शाब्दिक अर्थ है ऐसी पुरी जहाँ कोई वध न हो. इसी प्रकार इसका पर्यायवाची
अयोध्यापुरी का भी अर्थ हैं ऐसी पुरी जहाँ कोई युद्ध न हो. श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय ५, श्लोक १३)
के अनुसार 'नवद्वारे पुरे देही' कहकर इस नौ छिद्रों वाले शरीर को ही नवद्वार रुपी पुरी
बतलाया गया है जिसमें जीव यानि 'देही' का निवास है.
अपने अपने दृष्टिकोण,भावों और विचारों से हम अपने ही अंदर 'अवधपुरी' या 'लंका पुरी' की
स्थापना कर लेतें हैं. यदि हम स्वयं को शरीर मानकर अपने ही अहंकाररुपी रावण के साम्राज्य
में आसुरी सम्पदा ईर्ष्या, द्वेष,चिंता, दुराशा,दंभ आदि को लेकर जीते हैं तो लंकापुरी की स्थापना
हो जाती हैं.परन्तु, अवधपुरी की स्थापना के लिए अपने को शरीर मानना छोड़ हमें सद्विवेक का
अनुसरण कर 'आत्मज्ञान' की आवश्यकता है.
हमारे शास्त्रों में शरीर को आत्मा का एक आवरण मात्र बताया गया है. मै जब अपने
को शरीर मानता हूँ तो उसका 'वध' अथवा मरण अवश्यम्भावी है.जिस कारण मृत्यु भय
मुझे सताने लगता है.मृत्यु भय के रहते हृदय में 'रामजन्म' यानि चिर स्थाई आनंद का उदय
होना सम्भव ही नहीं है मृत्यु भय के कारण ही मै जीवन में तरह तरह की कुचेष्टायें करता हूँ.
समस्त भ्रष्ट आचरण की जननी ऐसी कुचेष्टाएं ही हैं .परन्तु , जब मै स्वयं को
'सत्-चित-आनंद' परमात्मा का अंश 'आत्मा' मानता हूँ तो आत्मा के अवध होने के कारण मुझे
यह समझ आ जाता है कि मेरी मृत्यु किसी भी प्रकार से भी सम्भव नहीं है. मै मृत्यु के
भय से निजात पा अपने ही स्वरुप 'आनंद' का निर्बाध रूप से चिंतन व अनुभव करने में
समर्थ हो जाता हूँ. श्रीमद्भगवद्गीता में आत्मा के बारे में कहा गया है :-
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत:
अर्थात इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, आग जला नहीं सकती,जल गला नहीं सकता,
और वायु सुखा नहीं सकती.
आत्मा का स्वरुप अजर है, अमर है,नित्य है, 'सत्-चित-आनंद' है, अवध है, अर्थात आत्मा का
'वध' कभी भी सम्भव नहीं है जब इन भावों और विचारों का विवेकपूर्ण पोषण कर मै अपने
हृदय में गहन चिंतन द्वारा अच्छी प्रकार से स्थापित कर लेता हूँ तभी मेरे हृदय में 'अवधपुरी'
स्थापित होने लगती है. मृत्यु का डर मेरे हृदय से निकल जाता है , हृदय शांत हो जाता है.
मेरे विचारों और भावों में भी कोई किसी प्रकार का संघर्ष या युद्ध नहीं रह जाता , इसीलिए
अवधपुरी को 'अयोध्यापुरी' भी कहा गया है. ऐसी अयोध्या या अवधपुरी में ही राम यानि
'सत्-चित-आनंद' का जन्म नवमी तिथि, दिन मंगलवार (भौम) और मधुमास यानि बसंत ऋतु
में होता है.
नवमी तिथि,मंगलवार और मधुमास हृदय की उन स्थिति का सूचक हैं जब आत्मज्ञान की
साधना ,अभ्यास और उपवास परिपक्वता को प्राप्त हो,और हृदय में मंगल व उल्लास का सर्वत्र
संचार हो जाये. 'उपवास' का अर्थ केवल कुछ खाना पीना छोडना मात्र नहीं ,बल्कि
मन बुद्धि के साथ राम के निकट जप, ध्यान और उपासना के द्वारा वास करना है .
'सत्-चित-आनंद' का भाव तब विभिन्न रंगों से मन को सदा सराबोर किये रखता है और
मन सहज ही गा उठता है :-
होली खेले रघुबीरा, अवध में होली खेले रघुबीरा
ऐसी पावन अवधपुरी को हमारा शत शत नमन है, जिसमें आत्मज्ञान रूपी 'सरजू' नदी सदा
प्रवाहित होती रहती है, जो 'कलियुग' की कलुषता का हृदय से नाश करती है और जिसमें
राम का जन्म होकर राम चरित्र का प्रकाश हो पाता है. अफ़सोस! ऐसे विकार रहित प्रभु
के हृदय में रहते भी जगत के सब जीव दीन और दुःखी है, नाम का निरूपण करके नाम
का यत्न पूर्वक जप रुपी साधन करने से वही राम ऐसे प्रकट हो जाता है जैसे रत्न के
जानने से उसका मूल्य. इसीलिए गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं :-
अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी , सकल जीव जग दीन दुखारी
नाम निरूपन नाम जतन ते , सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें
राम, दशरथ व कौशल्या के बारे में मेरी पोस्ट 'रामजन्म-आध्यात्मिक चिंतन-१' तथा चारो
युगों (सतयुग,द्वापर ,त्रेता एवम कलियुग) के बारे में मेरी पिछली पोस्ट
'रामजन्म-आध्यात्मिक चिंतन-२' में प्रकाश डाला गया है.जो सुधिजन चाहें वे इन पोस्टों
का अवलोकन कर अपने सुविचार प्रकट कर आनंद की वृष्टि कर सकते हैं.