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Thursday, May 5, 2011

रामजन्म - आध्यात्मिक चिंतन - ३

आनंद का चिंतन करना अदभुत है,  मंगलकारी है . आनंद का एक एक पद, एक एक शब्द,
एक एक अक्षर मधुरातिमधुर  है. आप सुधिजनों ने मेरी पोस्ट 'रामजन्म - आध्यात्मिक चिंतन- १' 
'रामजन्मआध्यात्मिक चिंतन- २'  पर जो टिप्पणियाँ कीं उनमें आनंद ही आनंद समाया है  ,
जिससे मन आनंद निमग्न हों गया है. और विशाल भाई के इन उद्गारों ने  " सत आनंद ,
चित आनंद, असीम आनंद,बोध स्वरूपानंद ,ज्ञान स्वरूपानंद,अनिर्वचनीय  आनंद,अचिन्त्य आनंद,
अपरिमेय आनंद,आनंदमय आनंद, बस आनंद ही आनंद." ने तो मानो आनंद की बरसात ही
कर दी है.

आईये चलिये आनंद की इसी तरंग में ही अब  आगे बढते हैं. राम,  दशरथ, कौशल्या, युगों का
तात्विक चिंतन कर लेने के पश्चात अब 'अवधपुरी' या 'अयोध्यापुरी' का तत्व चिंतन करने का
प्रयास करते हैं. गोस्वामी तुलसीदास जी रामचरितमानस में लिखते हैं:-

                              नौमि   भौम   वार   मधुमासा,  अवधपुरी    यह    चरित    प्रकासा 
                              बंदउ  अवधपुरी अति पावनि, सरजू सरि कलि कलुष नसावनि

अवधपुरी का शाब्दिक अर्थ है ऐसी पुरी जहाँ कोई वध न हो. इसी प्रकार इसका पर्यायवाची
अयोध्यापुरी का भी अर्थ हैं ऐसी पुरी  जहाँ कोई युद्ध न हो. श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय ५, श्लोक १३)
 के अनुसार 'नवद्वारे पुरे देही'  कहकर इस नौ छिद्रों वाले  शरीर को ही नवद्वार रुपी पुरी
बतलाया गया है जिसमें  जीव यानि 'देही' का निवास है.

अपने अपने दृष्टिकोण,भावों और विचारों से हम अपने ही अंदर 'अवधपुरी' या 'लंका पुरी' की
स्थापना कर लेतें हैं. यदि हम स्वयं को शरीर मानकर अपने ही  अहंकाररुपी रावण के साम्राज्य
में आसुरी सम्पदा ईर्ष्या, द्वेष,चिंता, दुराशा,दंभ आदि को लेकर जीते हैं तो लंकापुरी की स्थापना
हो जाती हैं.परन्तु, अवधपुरी की स्थापना के लिए अपने को शरीर मानना छोड़ हमें सद्विवेक का
अनुसरण कर  'आत्मज्ञान'  की आवश्यकता है.

हमारे शास्त्रों में शरीर को  आत्मा का एक  आवरण मात्र बताया गया है. मै जब अपने
को शरीर मानता हूँ तो उसका 'वध' अथवा मरण  अवश्यम्भावी  है.जिस कारण मृत्यु भय
मुझे सताने लगता है.मृत्यु भय के रहते हृदय में 'रामजन्म' यानि चिर स्थाई आनंद का उदय
होना सम्भव ही नहीं है मृत्यु भय के कारण ही मै जीवन में तरह तरह की कुचेष्टायें  करता हूँ.
समस्त भ्रष्ट आचरण की जननी ऐसी कुचेष्टाएं ही हैं .परन्तु , जब मै स्वयं को
'सत्-चित-आनंद' परमात्मा का अंश 'आत्मा'  मानता हूँ तो आत्मा के  अवध होने के कारण मुझे
यह समझ आ जाता है कि मेरी   मृत्यु किसी भी प्रकार से भी सम्भव नहीं है. मै मृत्यु के
भय से निजात पा अपने ही स्वरुप 'आनंद' का  निर्बाध रूप से चिंतन व अनुभव करने में
समर्थ  हो जाता हूँ.  श्रीमद्भगवद्गीता में आत्मा के बारे में कहा गया है :-

                                  नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः
                                  न  चैनं  क्लेदयन्त्यापो  न शोषयति मारुत:
अर्थात इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, आग जला नहीं सकती,जल गला नहीं सकता,
और वायु सुखा नहीं सकती.

आत्मा का स्वरुप अजर है, अमर है,नित्य है, 'सत्-चित-आनंद' है, अवध है, अर्थात आत्मा का
'वध' कभी भी सम्भव नहीं है  जब इन भावों और विचारों का विवेकपूर्ण पोषण कर मै अपने
हृदय में गहन चिंतन द्वारा अच्छी प्रकार से स्थापित कर लेता हूँ तभी मेरे हृदय में 'अवधपुरी'   
स्थापित होने  लगती है.  मृत्यु का डर मेरे  हृदय से निकल जाता है ,  हृदय  शांत हो जाता है. 
मेरे विचारों और भावों में भी कोई किसी प्रकार का  संघर्ष या युद्ध नहीं रह जाता ,  इसीलिए 
अवधपुरी को  'अयोध्यापुरी' भी कहा गया है. ऐसी अयोध्या या अवधपुरी में ही राम यानि
'सत्-चित-आनंद' का जन्म नवमी तिथि, दिन मंगलवार (भौम) और मधुमास यानि बसंत ऋतु
में होता  है.

नवमी तिथि,मंगलवार और मधुमास  हृदय की उन स्थिति का सूचक हैं जब आत्मज्ञान की
साधना ,अभ्यास और उपवास परिपक्वता को प्राप्त हो,और हृदय में मंगल व उल्लास का सर्वत्र
संचार हो जाये.  'उपवास' का अर्थ   केवल कुछ खाना पीना छोडना मात्र नहीं ,बल्कि
मन बुद्धि के साथ राम के निकट जप, ध्यान और उपासना के द्वारा  वास करना है .
'सत्-चित-आनंद' का भाव तब  विभिन्न रंगों से मन को सदा सराबोर  किये रखता है और
मन  सहज ही गा उठता है :-

                        होली खेले रघुबीरा,   अवध में होली खेले रघुबीरा

ऐसी पावन अवधपुरी को हमारा शत शत नमन है, जिसमें आत्मज्ञान रूपी 'सरजू' नदी सदा
प्रवाहित होती रहती  है, जो 'कलियुग' की कलुषता  का हृदय से नाश करती है और जिसमें 
राम का जन्म होकर   राम चरित्र का प्रकाश हो पाता  है. अफ़सोस!  ऐसे विकार रहित प्रभु
के हृदय में रहते भी जगत के सब जीव दीन और दुःखी है, नाम का निरूपण करके नाम
का यत्न पूर्वक जप रुपी  साधन करने से वही राम ऐसे प्रकट हो जाता है जैसे रत्न के
जानने से उसका मूल्य. इसीलिए गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं :-
        
               अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी , सकल जीव जग दीन दुखारी
               नाम निरूपन  नाम  जतन ते , सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें

राम,  दशरथ व कौशल्या  के बारे में मेरी पोस्ट 'रामजन्म-आध्यात्मिक चिंतन-१' तथा चारो
युगों (सतयुग,द्वापर ,त्रेता एवम कलियुग) के बारे में मेरी  पिछली  पोस्ट
'रामजन्म-आध्यात्मिक चिंतन-२' में  प्रकाश डाला गया है.जो सुधिजन चाहें वे  इन पोस्टों 
का अवलोकन कर अपने सुविचार प्रकट कर आनंद की वृष्टि कर  सकते हैं.

                     

Thursday, April 21, 2011

रामजन्म - आध्यात्मिक चिंतन -२

राम यानि 'सत्-चित-आनंद' का भाव  व्यक्ति के  ह्रदय में जैसे जैसे घर करने लगता है,
उस व्यक्ति के विचारों, उसके भावों और कर्मों में भी यह भाव परिलक्षित होने  लगता है.
वह बोलेगा तो आनंद होगा, वह लिखेगा तो आनंद होगा , वह मूर्ति या चित्र बनायेगा तो
उसकी बनाई मूर्ति या चित्र में भी आनंद द्रष्टिगोचर होगा . आनंद का चिंतन किसी भी
प्रकार से  निरर्थक नहीं हो सकता  है, अत: आनंद को  धारण करना अति आवश्यक है.

हृदय में आनंद का भाव जैसे जैसे किशोर अवस्था को प्राप्त करेगा तो वह  व्यक्ति की
दुराशा का भी नाश करेगा. यह दुराशा (wrong expectation) ही 'ताडका' रुपी राक्षसनी है, जो
जीवन में उलझन व भटकाव पैदा करती रहती  है. अपनी दुराशाओं की वजह से ही व्यक्ति
अपने अच्छे खासे जीवन को भी  नरक बना लेता है,

आनंद का भाव फिर आगे जाकर व्यक्ति की कठोरता, निष्ठुरता का भी अंत कर डालता है.
ये कठोरता और निष्ठुरता ही मानो  'खर-दूषण'  हैं ,जो  मन रुपी वन में छिपे दुर्दांत राक्षस हैं.
फिर अंत में यही आनंद  का भाव  उस व्यक्ति के अहंकार यानि 'दशानन' अथवा रावण को भी
मार गिरा कर रामराज्य या पूर्णानंद की स्थापना कर देता है.  अहंकार को 'दशानन'  इसलिये
कहा  कि इसके भी दशों सिर होतें हैं.  धन का, बल का , विद्या का , रूप का, यौवन का 
आदि आदि.  अहंकार के मरे बैगर 'पूर्णानंद' की स्थिति को प्राप्त नहीं किया जा सकता.

यदि हम किसी भी महापुरुष की जीवनी का सूक्ष्म अध्ययन करें तो पायेंगें कि उन
महापुरुष ने जीवन में 'सत्-चित-आनंद'  भाव को ही धारण किया और अपनाया  था ,जिस
वजह से वे महापुरुष बन सके  और जन जन  से  उनको सम्मान मिला. यह  जरूरी  नहीं कि
'सत्-चित -आनंद'  भाव को केवल रामरूप में ही धारण किया जाये. अपनी अपनी रुचि और
आस्था अनुसार वह कृष्ण, अल्लाह या ईसा आदि भी हो सकता है.

चूँकि  इस लेख में हम रामजन्म का आध्यात्मिक चिंतन  करने की कोशिश कर  रहें हैं,
तो फिर रामजन्म पर ही पुनः विचार करतें हैं.  राम के पिता 'दशरथ'जी को व राम की
माता 'कौशल्या' जी को हमने पिछले लेख 'रामजन्म -आध्यात्मिक चिंतन -१'  में समझने
का एक प्रयास किया था.  मन को यदि 'दशरथ' और बुद्धि को 'कौशल्या' बना लिया जाये
तो  राम का जन्म हमारे हृदय में ही संभव है.

कहतें हैं राम का जन्म त्रेता युग में हुआ था. अब हम  त्रेता युग में कैसे पहुंचें आईये इस
पर भी विचार करते हैं. गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस के 'उत्तरकांड' के दोहा
संख्या १०३ (ख} से आगे निम्न प्रकार से चारो युगों का निरूपण किया हैं:-

                      नित जुग धर्म   होहिं सब केरे ,   हृदयँ राम माया के प्रेरे 
                      सुद्ध सत्व  समता बिग्याना , कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना 

श्रीराम जी की माया से प्रेरित होकर सबके हृदयों  में सभी युगों के धर्म नित्य होते रहते हैं.
शुद्ध सत्व गुण , समता ,विज्ञान और मन का प्रसन्न होना ही 'सतयुग'  का प्रभाव होता है.
यानि यदि हममें सम्यक ज्ञान है, विवेक है,  समता है विज्ञान है और मन भी हमारा प्रसन्न
है तो कहा जा सकता है कि हम 'सतयुग' में  जी रहें हैं. गोस्वामी जी आगे लिखते हैं:-

                      सत्व बहुत रज कछु रति कर्मा , सब विधि सुख त्रेता का धर्मा
                      बहु रज स्वल्प सत्व कछु तामस, द्वापर धर्म हरष भय मानस

सत्वगुण अधिक हो ,कुछ रजो गुण हो ,अर्थात क्रियाशीलता हो, कर्मों में प्रीति हो, सब प्रकार
से सुख हो तो यह त्रेता का धर्म है. यानि सतोगुण के रूप में  ज्ञान और विवेक के साथ साथ
कुछ क्रियाशीलता स्वरुप  कर्मों में प्रीति होने से हृदय में रजो गुण का भी संचार हो तो कह
सकते हैं कि उस समय हम 'त्रेता युग' में जी रहें हैं
.
परन्तु जब रजोगुण अधिक बढ़ जाये, सत्व गुण के रूप में ज्ञान और विवेक थोडा ही रह जाये
और कुछ तमोगुण के रूप में ह्रदय में आलस्य ,प्रमाद, अज्ञान और हिंसा का भी संचार होकर
मन में  कभी हर्ष  हो ,कभी भय हो तब  कह सकते हैं हम 'द्वापर युग' में जी रहे हैं.
'कलियुग' का निरूपण करते हुए गोस्वामीजी आगे  लिखते हैं:-

                      तामस बहुत रजोगुण थोरा ,   कलि प्रभाव विरोध चहुँ ओरा

तमोगुण अर्थात आलस्य, अज्ञान, प्रमाद,  हिंसा आदि हृदय में  बहुत बढ़ जाये ,रजोगुण
अर्थात क्रियाशीलता कम हो जाये, और ज्ञान व विवेक का तो मानो लोप ही हो जाये,
हृदय में चहुँ ओर विरोधी वृत्तियों का ही वास हो, सब तरफ अप्रसन्नता और विरोध हो,
तो कह सकते हैं हम उस समय 'घोर 'कलियुग' में ही जी रहे है.

यदि हम 'कलियुग' में जी रहें हो तो क्या यह संभव है कि हम अपनी मन:स्थिति को "त्रेता
युग' की बना लें. गोस्वामीजी इसका उत्तर इस प्रकार से देते हैं:-

                     बुध जुग धर्म जानी मन माहीं , तजि अधर्म रति धर्म कराहीं 

बुद्धिमान लोग अपने मन का अवलोकन कर यह जान लेते हैं कि उनका मन कब  किस
स्थिति में हैं .यानि मन 'कलियुग' में है या द्वापर में . वे मन कि स्थिति में सुधार लाने
के लिए तब अधर्म को तज  कर धर्म करने में रूचि लेने लगते हैं. धर्म करने का तात्पर्य यहाँ
उन बातों के पालन करने से है जिससे मन में सतोगुण का उदय होकर ज्ञान और विवेक का
संचार हो और तमोगुण व रजोगुण घटकर  'सत्-चित-आनंद ' भाव को ह्रदय में स्थाई रूप से
धारण किया जा सके. 

विभिन्न साधनों जैसे नामजप आदि  में सत्संग भी इसके लिए अति उत्तम साधन है.
सत्संग के सम्बन्ध में  कुछ विचार मेरी पोस्ट 'बिनु सत्संग बिबेक न होई'  में भी  किया
गया है. मेरा  सुधिजनों से निवेदन है कि सत्संग पर चिंतन के  लिए वे मेरी कथित पोस्ट
का अवलोकन कर सकते हैं.

यहाँ पर यह बताना भी मै उचित समझता हूँ कि तीनो गुणों अर्थात सतोगुण, रजोगुण व
तमोगुण के बारें में विस्तृत विवेचना भगवद्गीता के १४ वें अध्याय 'गुणत्रयविभागयोग'
में की गई जिसका सुधिजन अध्ययन कर लाभ उठा सकतें हैं.

इस प्रकार से हम श्री रामचरित्र मानस में और श्रीमद्भगवद्गीता में वर्णित ज्ञान के आधार
पर  स्वयं अपने हृदय में ही 'त्रेतायुग' का उदय कर रामजन्म का मार्ग प्रशस्त कर सकतें हैं.

इससे अगली पोस्ट में हम 'अवधपुरी' / 'अयोध्यापुरी'  व 'उपवास' आदि पर विचार करने
का प्रयास करेंगे.

मेरी चारों 'युगों' पर  जी टीवी के मंथन कार्यकर्म में की गई  चर्चा का
कुछ अंश ' http://www.zeenews.com/video/showvideo11180.html '  पर उपलब्ध है.
मेरा  शुरू का परिचय  ' http://www.zeenews.com/video/showvideo11181.html '  पर
कराया गया है.


         


Wednesday, April 13, 2011

रामजन्म - आध्यात्मिक चिंतन -१

रामजन्म के पावन पर्व रामनवमी  की समस्त ब्लोगर जन को हार्दिक शुभकामनाएं.
इस पोस्ट में मै आप सभी सुधिजनों के साथ रामजन्म  के विषय  में आध्यात्मिक चिंतन
करना चाहता हूँ ,जिसपर मैंने अपने कुछ विचार " जी न्यूज "  चैनल पर रामनवमी के 
दिन  (दि. १२.०४ .२०११)  को "मंथन" कार्यकर्म (सुबह ६ से ७ बजे) में  प्रस्तुत किये थे.

इस कार्यकर्म के लिए  मै न तो कोई विशेष तैय्यारी कर पाया था और न ही मुझे ऐसे किसी
कार्यकर्म में सम्मिलित होने का  कोई किसी प्रकार का अनुभव था.जो भी विचार मैं अपने
इस कार्यकर्म में रख पाया ,हो सकता है उनमें  त्रुटियाँ रह गई हों.  इसीलिए  इस पोस्ट का
सर्जन कर रहा हूँ  ताकि उन विचारों को यहाँ  सम्मिलित करते हुए आप सभी सुधिजनों  के समक्ष
भी रामजन्म पर  आध्यात्मिक चिंतन प्रस्तुत कर सकूँ.आशा है आप सभी   सुधिजन इस चिंतन
में सम्मलित हो अपने अपने बहुमूल्य विचारों को प्रस्तुत कर चर्चा को सार्थकता प्रदान करेंगें.

विषय को आगे बढ़ाने से पूर्व मै अपना हार्दिक  आभार व धन्यवाद  "जी न्यूज" चैनल   को,
प्रिय भाई खुशदीप जी, आदरणीय सर्जना शर्माजी, कार्यकर्म के संचालक श्री विनोद कुमार शर्माजी
और एंकर ममता जी व 'मंथन ' कार्यकर्म  की समस्त  टीम  व स्टाफ   को प्रेषित करना चाहता हूँ,
जिनके प्रोत्साहन व सहयोग की बिना मै रामजन्म पर अपना चिंतन 'मंथन' कार्यकर्म में  प्रस्तुत
नहीं कर सकता था.
मै सर्जना शर्मा जी के अच्छे स्वास्थ्य के लिए दुआ करता हूँ और भगवान से प्रार्थना करता हूँ
कि वे  अतिशीघ्र स्वास्थ्य लाभ कर अपने 'रसबतिया' ब्लॉग के माध्यम से हम सब में भी सैदेव
रस और मंगल का संचार करती रहें.

राम को हम तीन स्तरों पर जान सकते हैं. आधिभौतिक ,आधिदैविक  और आध्यात्मिक .
आधिभौतिक के द्वारा हम राम को  भौतिक जगत में इतिहास ,भूगोल आदि के माध्यम से जानने
का प्रयास करते हैं, आधिदैविक में हम उनके  दैवीय पक्ष को पुराणों आदि के माध्यम से जान पाते हैं.
आध्यात्मिक में हम उनको तत्व चिंतन के द्वारा जानने का प्रयत्न करते हैं.इस पोस्ट में मेरा ध्येय
राम को आध्यात्मिक चिंतन के द्वारा  जानने और समझने  का  है.

राम वह है जो कण  कण में रमता हैं .वह परमात्मा है वह ही परमधाम है, जिसको पाकर हमें
पूर्ण शांति और विश्राम  आये.वह निराकार भी है और साकार भी , निर्गुण भी है और सगुण भी.
भगवद्गीता के १२ वें अध्याय 'भक्ति योग' के अनुसार परमात्मा की भक्ति उनके निर्गुण निराकार
व सगुण  साकार दोनों ही रूपों  को ध्यान में रख कर  की जा सकती है.आवश्यकता  है तो मन और बुद्धि
को परमात्मा में लगाने की .गीता (अ.१२ श.८)  में कहा गया है
                                   मय्येव मन आधत्स्व  मयि बुद्धिं  निवेशय
अर्थात तू मुझ में ही मन को लगा और मुझ में ही बुद्धि का निवेश कर ,इसके उपरांत तू मुझ में ही
निवास करेगा,इसमें कुछ भी संशय नहीं है .

अनेक  उदहारण  से  हम साकार  को समझ सकते हैं.  जैसे पानी भाप  रूप  में निराकार होता है
परन्तु यदि उसको ठंडा करके किसी बर्तन में जमा लिया जाये तो वही  बर्फ रूप में  साकार हो जाता है
और वही रूप  ले लेता है जो बर्तन का होता है. इसी प्रकार निराकार परमात्मा  भक्तों के हृदय रुपी
बर्तन में श्रद्धा और भक्ति से घनीभूत हो साकार रूप से भी व्यक्त होजाता  है.
तुलसीदासजी  ने रामचरित्र मानस में राम के निर्गुण निराकार और सगुण साकार दोनों ही रूपों की
अति सुन्दर विवेचना की है. निर्गुण निराकार रूप का वर्णन करते हुए तुलसी लिखते हैं
                             एक अनीह अरूप अनामा , अज सचिदानंद  पर धामा 
यानि परमात्मा एक है, उसकी अपनी कोई इच्छा नहीं है , उसका कोई रूप नहीं है, उसका कोई नाम नहीं है 
उसका कोई जन्म नहीं है, वह सत्-चित-आनन्द  है  और वह ही परमधाम है.
दूसरी ओर तुलसी राम की बाल छवि  को ह्रदय में आकार देते हुए आनन्द से  निहारते हुए  कहतें हैं

                         " वर दन्त की पंगति  कुंद कली,अधराधर पल्लव खोलन की 
                           चपला चमके घन बीच  जगे, ज्यूँ मोतिन माल अमोलन की 
                           घुन्घरारी लटें  लटकें मुख  ऊपर    ,कुंडल लोल कपोलन की
                           न्योछावरी प्राण करें तुलसी, बलि जाऊं लला इन बोलन  की " 

तथ्य यह है कि  हम सब आनन्द चाहते हैं और आनन्द की खोज में ही जीवन में भटक रहे हैं.
सच्चे आनन्द के स्वरुप को न जानने और न पहचानने की वजह से ही यह भटकन है.
यदि हमें ऐसा आनन्द मिले जो क्षणिक हो,अस्थाई हो ,समय से बाधित हो ,आज हो कल न हो ,
तो उससे हमे पूर्ण संतुष्टि और आराम नहीं मिल सकता. परन्तु  यदि आनन्द 'सत् ' हो ,चिर
स्थाई हो ,काल बाधित न हो, हमेशा बना रहे,ज्ञान और प्रकाश स्वरुप हो अर्थात 'चेतन' हो तो
ऐसा ही आनन्द 'सत्-चित-आनन्द' होता है जिसकी  हम खोज रहे हैं , जिसे शास्त्रों में परमात्मा कहा
गया है.ऐसे आनन्द को प्राप्त करना ही  हमारा परम लक्ष्य है,वही आखरी मंजिल है
इसीलिए वह ही 'परम धाम' है.  आनन्द के सम्बन्ध में कोई पूर्वाग्रह करना कि वह
निर्गुण निराकार ही  हो, या सगुण साकार न हो उचित नहीं जान पड़ता.

कहते हैं राम के पिता का नाम दशरथ है.तुलसी लिखते हैं
                            'मंगल भवन अमंगलहारी ,द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी '
दसरथ के आँगन में बिहार करनेवाले मंगल के भवन और अमंगल का हरण करने वाले श्रीराम
मेरे पर द्रवित हों,अर्थात पसीजें मेरे पर कृपा करें.

दशरथ का तात्पर्य   सतोगुण संपन्न ऐसा मन है जो पांच ज्ञानेन्द्रियों और पांच कर्मेन्द्रियों के दश
रथों  पर सवार होकर जीवन में नौ श्रेष्ठ  मनोरथों को छोड़ ,दशम सर्वश्रेष्ठ  मनोरथ 'सत्-चित आनन्द '
को ही ध्येय  बना उसे  मन के आँगन में ही प्राप्त भी कर लेता है.इसलिये ऐसा मन दशरथ है और
सत्-चित -आनन्द रुपी  राम का जनक है.

यह भी कहते हैं कि राम की माता का नाम कौशल्या है. तुलसी लिखते हैं
                           "बंदउ कौशल्या दिसि प्राची ,कीरती जासु सकल जग माची "
मै कौशल्या जी की वंदना करता हूँ जो  कि 'पूर्व दिशा ' हैं, जिनकी ख्याति समस्त जगत में फैली
हुई   है. पूर्व दिशा में ही सूर्य का उदय होता है.यहाँ  'सत्-चित आनन्द ' का भाव ही सूर्य है.
कौशल्या वह बुद्धि है जो विचार करने में  अति कुशल है, सूक्ष्म है,एकाग्र  है, और सद्-चिंतन
के कौशल से " सत्-चित-आनन्द " भाव यानि राम जी का प्रसव करती है. इसलिये ऐसी बुद्धि
कौशल्या है और रामजी की माता है.

अब एक उदहारण  द्वारा इसको समझने का पुनः प्रयास करतें हैं. यदि  एक सुन्दर महल बना है
तो वह सगुण साकार रूप में नजर आता है. परन्तु जब वह महल  नहीं बना  था,तब वह  निर्गुण
निराकार के रूप में उसके रचयिता  के मानस में विद्यमान  था . पहले उसको  बनाने का भाव
रचियता के मन में प्रकट हुआ ,वही पुष्ट होकर जब मन में स्थापित हो गया और रचियता की
बुद्धि ने उसपर गहन मनन किया तो  प्रथम उस महल का नक्शा प्रकट हुआ और फिर जब उसका
नक़्शे  अनुसार ही निर्माण किया गया तो वह महल सगुण  साकार  रूप में प्रकट हो गया.सगुण
साकार रूप में वह महल वही वही सुविधा व आराम देने लगा जिन जिन को उसके रचयिता ने
अपने मन और बुद्धि  में धारण किया था. यदि उस महल में कमियां होंगी तो उन सब का कारण
रचियता के मन और बुद्धि ही हैं.

यदि मन हमारा दशरथ हो, बुद्धि हमारी कौशल्या  तो ही वे राम यानि सत्-चित-आनन्द  को जन्म
दे सकतें हैं और ऐसे ही मन और बुद्धि वन्दनीय है,  तुलसी के शब्दों में हम फिर  कह सकतें हैं

                         " भये प्रकट कृपाला ,दींन दयाला  कौसल्या हितकारी 
                            हर्षित महतारी ,मुनि मन हारी,अदभुत रूप विचारी 


रामजन्म की सभी को एक बार फिर शत शत बधाइयाँ .

अगली पोस्ट में हम अवधपुरी, त्रेतायुग, उपवास आदि का  तत्व चिंतन करने का प्रयास करेंगें,
जिनका चिंतन उपरोक्त जी न्यूज चैनल के' मंथन ' कार्यकर्म  में भी किया गया था.रामनवमी
पर प्रसारित  मंथन प्रोग्राम को 'www.zeenews.com'  और संभवतः 'www.youtube.com' पर भी
देखा जा सकता है.

बैसाखी के पावन पर्व की सभी सुधिजनों को हार्दिक शुभकामनाएँ !

Monday, April 4, 2011

वंदे वाणी विनायकौ

           वर्णानां अर्थसंघानां रसानां छंद सामपि,
           मंगलानां च कर्त्तारौ वंदे वाणीविनायकौ

अक्षरों, अर्थ समूहों, रसों, छंदों और मंगलों के करने वाले वाणी विनायक जी की मै
वंदना करता हूँ. यह प्रार्थना तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के बालकाण्ड में सबसे
पहले की है.

वाणी का प्रयोग हम सर्वत्र करते हैं, फिर चाहे वह लेख हो या कविता. ब्लॉग जगत में
भी हम अपनी वाणी को अपनी पोस्ट के माध्यम से व टिपण्णी और प्रतिटिपण्णी के 
माध्यम से व्यक्त करने की कोशिश करते हैं. वाणी विनायक ऐसे शुभ चिंतन और विवेक
का प्रतीक हैं  जिसके आवाहन  से वाणी में निम्न तत्व दृष्टिगोचर होने लगते हैं, जिनमें से 
यदि एक भी रह जाये तो   वाणी की सफलता अधूरी ही जान पड़ती है. 

वर्णानां        -    वाणी वर्णों के बिना व्यक्त नहीं हो सकती. वर्णों का ज्ञान और उनका 
                      प्रयोग करना आना चाहिए. यदि हिन्दी में वाणी व्यक्त कर रहें हैं तो 'क'
                      'ख' ,'ग'  तो आना ही चाहिये. 

अर्थसंघानां  -     जिन वर्णों का हम प्रयोग कर कर रहें उनसे कुछ अर्थ या उनका मतलब भी
                      निकलना चाहिये. अर्थ एक ही नहीं अनेक भी हो सकते है. इसीलिए कहा गया
                       'अर्थ संघानां'

रसानां          -   जो अर्थ वर्णों  के प्रयोग से निकले, उसके द्वारा रस का संचार भी होना चाहिये .
                      बिना रस के अर्थ रुखा रुखा सा ही लगता है. 

छंद सामपि -    रसमय अर्थ के अतिरिक्त वाणी सुन्दर गायन भी प्रस्तुत करे तो कर्णप्रिय,
                       मधुर  व और भी उत्तम हो जाती है.

मंगलानां       -   जब वाणी मंगल करने वाली भी हो तो वह सर्वोत्तम हो जाती है.

वाणी को उपरोक्त तत्वों से ओतप्रोत करने के लिए ही वाणी के तप की आवश्यकता है.
तप का अर्थ है सीखना, सदैव प्रयासरत  रहना.  भगवदगीता में वाणी के तप के बारे में
कहा गया है (अ.१७   श्.१५)
              
                            अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्
                            स्वाध्याय अभ्यसनम चैव वाड़्मयम् तप उच्यते

अर्थात जो वाक्य  उद्वेग न करने वाले हों , किसीको पीड़ा न पहुचानें वाले हों, सत्य हों,
प्रिय हों और हित अर्थात मंगल करनेवाले भी हों ,जो स्वाध्याय, सद् ग्रंथों के पढ़ने, मनन
करने के अभ्यास  का परिणाम हों, वे वाणी का तप कहलाते है.

वाणी केवल सत्य हो, पर कड़वी हो और हित  न करती हो  तो ऐसी वाणी भी अनुकरणीय
नहीं हो सकती. जैसे एक मरणासन्न व्यक्ति को डाक्टर उसे दिलासा दिलाता है कि वह
ठीक हो जायेगा ,यध्यपि असत्य  है पर  गलत नहीं माना जाता . क्यूंकि यह दिलासा हित
करनेवाला है और मरीज में  नई जान भी फूँक सकता है.

जो भले व्यक्ति हैं वे हमेशा भलाई ही ग्रहण करने में लगे रहतें हैं. भले ही किसी पोस्ट में
वाणी के उपरोक्त सभी तत्व मौजूद न भी हों ,परन्तु यदि  हित अथवा मंगल का तत्व
उसमें है तो भी वे उसे ग्रहण  करते हैं  अर्थात 'सार सार को गहि लई, थोथा दई उडाय'. 
परन्तु नीच का स्वाभाव इसके उलट होता है.  वे किसी न किसी प्रकार से निंदा करना ही
पसंद करते हैं. कहा  गया है :-

                              भलो भलाइहि पई लहइ, लहइ निचाइहि नीचु
                              सुधा सराहिअ अमरताँ ,गरल सराहिअ   मीचु

भला भलाई ही ग्रहण करता है और नीच नीचता को ही ग्रहण करता है. अमृत की सराहना
अमर करने में होती है और विष की मारने में.

मेरा सभी सुधिजनों से विनम्र निवेदन है की मेरी इस पोस्ट और पिछली पोस्टों  में जो भी
उचित और मंगलकारी लगे केवल उसी को ग्रहण किया जावे. मै कोई उपदेशक नहीं , न ही
कोई लेखक या कोई ज्ञानी ध्यानी . बस एक साधारणसा ब्लोगर मात्र  हूँ, आप सबके बीच
केवल  विचारों के आदान प्रदान करने हेतू ही चला आया हूँ'  कुछ 'फोकटिया सत्संग' के माध्यम से.

आशा है आप मुझे सहन और स्वीकार करेंगे.  मेरी यह पोस्ट पढकर यदि आपको ऐसा लगे
कि आपका कीमती समय व्यर्थ हुआ है अथवा मेरे से कोई  त्रुटि रह गयी हो या गलत बात
लिखी गयी हो तो आप मुझे क्षमा करेंगें.  इस पोस्ट पर जो भी टिपण्णी आप करें मन से और
सच्चाई से  करें, ताकि भविष्य के लिए मेरा उचित मार्गदर्शन हो सके और मैं अपने में
वांछित सुधार ला सकूँ.

                          सर्वे भवन्तुः सुखिनः सर्वे संतु निरामयः

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Sunday, March 20, 2011

बिनु सत्संग बिबेक न होई

शुभ भावों और विचारों का ऐसा बहायें रंग, मन भीगे होली में और खूब जमे सत्संग
तन की होली तो आज सभी खेल रहें है,चलिए थोडा मन की होली भी खेल ली जाये.

मन की होली के लिए प्रथम 'शुभ' के प्रतीक गणेशजी का ध्यान करते हुए मन -मष्तिक में
सुंदर भावों और विचारों का आवाहन करते हैं और फिर सर्जन के प्रतीक ब्रह्मा जी का
पूजन करते हैं ताकि एक अच्छी सार्थक पोस्ट का सर्जन हो . वाणी की प्रतीक सरस्वती जी
का वंदन  करते हुए आईये रंगों की  सुंदर बौछार शुरू करते है.  लेकिन साहब रंग भी तो 'श्रेय'
मार्का पक्के  ही होने चाहिए जो  सत्यम शिवम सुंदरम के भावों को पोषित करते हुए जीवन
 को आनंदमय बना सदा कल्याण करें .   'प्रेय'  मार्का  नकली और सस्ते रंगों से तो बचना
 पड़ेगा  जो मिलावटी होते  हैं  और अन्ततः नुकसान ही करते हैं.
 लेकिन 'श्रेय' मार्का रंग आसानी से बाजार में उपलब्ध नहीं है. ऐसे रंगों की पहचान के लिए
 विवेक की अति आवश्यकता है. अब विवेक कहाँ से लाएं?   चिंता की कोई बात नहीं है ,यह
 भी मिल ही जायेगा, बस थोडा सत्संग जमा लिया जाये, क्योंकि रामचरितमानस में
तुलसीदास जी  कह गए हैं:-

बिनु सत्संग बिबेक न होई , राम कृपा बिनु सुलभ न सोई

यूँ तो सत्संग और राम कृपा से सभी परिचित होंगे ,फिर भी जब रंग बहाने ही हैं तो यहाँ सत्संग
 और राम कृपा को थोडा और समझने का प्रयास करते हैं. सत्संग का मतलब सच्चा संग.
साधारणतया सत्संग का मतलब हम कुछ कीर्तन,  भजन, गाना या प्रवचन आदि सुनना ही समझते
हैं. लेकिन संग तो हमारा बहुत सी चीजों से हो सकता है. जैसे भोजन करते समय भोजन का.
अच्छा पोष्टिक सतोगुणी भोजन ग्रहण करें तो खाने का सत्संग होता है .इसी प्रकार सही समय
 पर सही काम करें तो समय का सत्संग  होता है.  सुबह जल्दी उठकर शौच आदि से निवर्त हो
 व्यायाम, स्नान ध्यान पूजन करें तो सुबह के समय का अच्छा सत्संग हो जाता है..अच्छी
ज्ञानवर्धक पुस्तकें पढ़ें तो  पुस्तकों का सत्संग हो जायेगा. अच्छी पोस्टों का पढ़ना ,
उनपर सार्थक टिप्पणिओं और प्रति-टिप्पणिओं को पढ़ना और करना भी  ब्लॉग
जगत का सत्संग है.  अच्छे सकारात्मक  सद्  विचारों का संग भी सुन्दर सत्संग है.
 सद् गुणी ज्ञानवान व्यक्तिओं का संग भी सत्संग ही कहलाता है  कर्णप्रिय शांति ,
आनन्द  और सद्  भावों का संचार करने वाले संगीत का सत्संग . आदि आदि.
मतलब ये कि जब तक हम सत्संग नहीं करते हैं तब तक हमारा बुरी बातों से निसंग नहीं हो पाता.
यदि हम तमो रजो गुणी खाना ही खाते रहेंगे  तो सतो गुणी खाने के आनन्द का अनुभव कैसे कर
सकते हैं.सत्संग से   आनन्द का अनुभव जैसे जैसे बढ़ता जाता है,  अनावश्यक बेकार कि बातों से
छुटकारा मिलता जाता है. सत्संग से कितनें लोगों को बुरी आदतों जैसे स्मोकिंग,शराब,
गुस्सा करना आदि से छुटकारा पाते हुए   मैंने देखा है . जैसे जैसे बुरी बातों से निसंग
 होता जाता है ,मन में मोह यानि अज्ञान का विनाश हो ज्ञान का प्रकाश होता जाता है,
ज्ञान के उदय होने से ही विवेक का उदय होता है .विवेक के द्वारा ही निश्चल तत्व
समझने में  आने लगता है कि जीवन में क्या करना है और क्या नहीं.  ऐसा समझ आते
 ही तो फिर  जीवन  निश्चल तत्व  की  प्राप्ति की  ओर अग्रसर हो जाता है . यदि ऐसा
जीवन में घटित होता है और सभी  भ्रमों से छुटकारा मिल जाये तो यही जीवन मुक्ति है.
आदि गुरु शंकराचार्य जी ने अपने मोह-मुद्गर में लिखा है

                   सत्संग गत्वे निसंगत्वं, निसंगत्वे  निर्मोहत्वम
               निर्मोहत्वे निश्चल तत्वम,निश्चल तत्वे जीवनमुक्ति
            भज गोविन्दम भज गोविन्दम ,गोविन्दम भज मूड मते


तो फिर मुक्ति के लिए उलझन और भटकन कैसी?  मुक्ति तो आप-हम सब का इन्तजार कर रही
है, बस जरा सत्संग जमा लीजिए . लेकिन थोडा रुकिए, राम कृपा को भी तो समझ लेते हैं.राम
कृपा हमारे पिछले और वर्तमान कर्मों का ही तो समग्र रूप है . भूतकाल में यदि हमने अच्छे विचारों,
भावों और कर्मों का संग किया हो तो सत्संग हमे कभी न कभी  दैव योग से
 मिल ही  जाता है ,और यदि वर्तमान में  ही अच्छे विचारों, भावों और  कर्मों का संग
 करें तो तत्काल  राम कृपा हो  जाती है और सत्संग सहज रूप से सदा उपलब्ध रहता है.
 पिछले का पछताना क्या,अब तो वर्तमान की ही सोचें . कहा भी  गया है

बीती ताहि बिसार दे आगे की सुध लेई

आईये  'श्रेय'  रंगों की बौछार से सत्संग जमा ही लेते हैं.
आपकी  सार्थक और रंगारंग टिप्पणिओं का इन्तजार है.
देर न लगाइये  बस आ जाईये ,खुशी  के रंगों  से नहला  जाईये .


आप सभी को होली के पावन रंगमय पर्व पर बहुत बहुत मंगल कामनायें .
   

जाते जाते हमारी पत्नी साहिबा की ओर से कुछ रसमयी तुकबंदी

कोयल की कूक सुन
मन में उठी उमंग
रोम रोम बहने लगी
मादक,मृदुल तरंग
उपवन में चलने लगी
मीठी ,मधुर बयार
आते ही मधुमास ने
दिया है अपना प्यार
फागुन में जब मौज से
पूछा उसका हाल
चहुँ और उड़ने लगा
केसरिया गुलाल
डाल डाल लहरा  गया
सुंदर पुष्प गुलाब
साँसों में राधा बसी
धडकन में नन्द लाल
पिचकारी का 'बैट' है
'गेंद ' बने हैं गाल
क्रिकेट की होली खिले
खेलें मेरे लाल
प्याज भी नाराज है
रूठा  हम से तेल
महंगाई हँस कर कहे
मुझसे होली खेल
जनता से नेता खेल  रहे हैं
भ्रष्टाचार की होली,
पर आओ हम सब मिलकर खेलें
प्यार,विश्वास,स्नेह की होली








Sunday, March 6, 2011

ऐसी वाणी बोलिए

सुर और असुर समाज में हमेशा से ही होते आयें हैं.  सुर वे जन हैं जो अपने विचारों ,भावों
और कर्मो के माध्यम से खुद अपने में  व समाज में  सुर ,संगीत और हार्मोनी लाकर
आनन्द और शांति की स्थापना करने की कोशिश में लगे रहते हैं.  जबकि असुर  वे  हैं
जो इसके विपरीत, सुर और संगीत के बजाय अपने विचारों ,भावों और कर्मो के द्वारा
अप्रिय शोर  उत्पन्न करते रहते हैं और समाज में अशांति फैलाने में कोई कोर कसर
नहीं छोड़ते.   इसका मुख्य कारण तो यह ही समझ में आता है कि सुर जहाँ ज्ञान का
अनुसरण कर जीवन में 'श्रेय मार्ग' को   अपनाना अपना ध्येय  बनाते हैं वहीँ असुर अज्ञान
के कारण 'प्रेय मार्ग'  पर ही अग्रसर रहना पसंद करते हैं और जीवन के अमूल्य वरदान को भी 
 निष्फल कर देते हैं. 
'प्रेय मार्ग'  तब तक  जरूर अच्छा लगेगा जब तक यह हमें भटकन ,उलझन ,टूटन  व अनबन
आदि नहीं प्रदान कर देता.  जब मन विषाद से अत्यंत ग्रस्त हो जाता है तभी हम कुछ
सोचने  और समझने को मजबूर होते हैं. यदि हमारा सौभाग्य हो तो ऐसे में ही संत समाज
और सदग्रंथ हमे प्रेरणा प्रदान कर उचित मार्गदर्शन करते हैं.
वास्तव में तो चिर स्थाई चेतन आनन्द की खोज में हम सभी लगे हैं. जिसे शास्त्रों में
ईश्वर के नाम से पुकारा गया है. ईश्वर के बारें में हमारे शास्त्र बहुत स्पष्ट हैं.
यह कोई ऐसा .काल्पनिक  विचार नहीं कि जिसको पाया न जा सके. इसके लिए 
आईये  भगवद गीता अध्याय १० श्लोक ३२ (विभूति योग) में  ईश्वर के बारे में दिए गए
निम्न शब्दों पर विचार करते हैं .
                                                  "वाद:   प्रवदतामहम"
अर्थात परस्पर विवाद करनेवालों का तत्व निर्णय के लिए किये जाने वाला वाद हूँ मै .

विभूति  का अर्थ यहाँ ब्राह्य जगत में ईश्वर (यानि परमानन्द)  के दर्शन और अनुभव से है
और 'योग' माने जब ऐसे  दर्शन  और अनुभव से हम मन और बुद्धि के  माध्यम  से स्वयं  जुड
जाएँ .वाद के द्वारा भी चिर स्थाई चेतन आनन्द से जुड़ा जा सकता है ऐसा आशय है गीता 
के उपरोक्त श्लोक का .जब हम परस्पर विवाद अथवा तर्क करतें हैं तो यह मुख्यतः निम्न 
 तीन प्रकार से किया जा सकता है 

(१ ) जल्पना - जहाँ तर्क करनेवालों में एक पक्ष केवल अपने ही तर्क प्रस्तुत करने में  लगा
                        रहता है और दूसरे पक्ष को बिलकुल सुनने की कोशिश ही नहीं करता .

(२ )वितण्डा -  जहाँ तर्क करने वालों में एक पक्ष दूसरे पक्ष की बातों को जानबूझ कर काटने
                        में लगा रहता है भले ही दूसरे पक्ष की बातें  बिलकुल ठीक भी हों .

(३ ) वाद  -       जब तर्क करने वाले इस प्रकार से तर्क करते हैं कि एक पक्ष अपनी बात
                       कहता है दूसरा पक्ष उसे सावधानीपूर्वक सुनता है और जब प्रथम पक्ष अपनी
                       बातें कह लेता है तो दूसरे पक्ष की बातें प्रथम पक्ष सावधानीपूर्वक सुनता है   
                       और दोनों पक्षों का उद्देश्य तर्कों के माध्यम से सकारात्मक तत्व को पाना
                       अर्थात 'तत्व-निर्णय' करना होता है. जो दोनों  पक्षों को ही नहीं अपितु सभी
                       को आनन्द प्रदान करनेवाला होता है .

  अब आप ही हमें  बताएं कि जीवन में  आनन्द की प्राप्ति हेतु   हम तर्क करते हुए 
 'जल्पना'  व 'वितण्डा' को अपनाएं या 'वाद'  को.
  
 ब्लॉग जगत में भी हम अपनी पोस्ट के माध्यम से अपने भाव और विचार प्रस्तुत
 करते हैं और दूसरों की पोस्ट पर  अपनी टिपण्णी देकर अपने अपने भाव और विचार
 प्रकट करते हैं. क्या इन सब का उदेश्य भी आनन्द की ही प्राप्ति नहीं है ?
 क्या ब्लॉग जगत में भी वाद की आवश्यकता नहीं है?

यदि हाँ और आप भी  गीता की वाणी से सहमत हों , तो चलिए हम सब 'वाद' को  
अपनाकर परमानन्द की प्राप्ति की ओर अग्रसर हों और अपने जीवन को मधुर मधुर
वाणी के द्वारा सफल बनाते जाएँ . क्योंकि तर्क वाणी  का ही तो परिणाम हैं जिससे
सुर और संगीत भी पैदा हो सकता है .

"ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोय , औरन को शीतल करे आपहु शीतल होय  " 

सभी सुधिजनों से विन्रम निवेदन है कि वे मेरी पिछली पोस्ट्स  का अवलोकन कर उन
पर भी अपने बहुमूल्य विचारों से अवगत कराएँ.  'श्रेय मार्ग ' और 'प्रेय मार्ग' के  बारे में 
 मेरी पोस्ट 'मुद् मंगलमय संत समाजू'  में भी प्रकाश डाला गया है.


Tuesday, March 1, 2011

मुद मंगल मय संत समाजू

कहते हैं प्रयागराज तीर्थ  में तीन अति पवित्र नदियों का संगम होता है. गंगा ,जमुना और सरस्वती.  प्रतीक रूप में  जहाँ  गंगा को भाव और भक्ति की धारा माना गया है तो यमुना को विधि और निषेध    (यह करो और यह न करो) रुपी कर्मों की कहानी , और सरस्वती को तो ब्रह्म ज्ञान की  वह  गुप्त धार मानते हैं  जो  जगत में भी गुप्तरूप से प्रवाहित  होती रहती है.  इसीलिए प्रयागराज को तीर्थराज कहा जाता है . संतों के समाज को भी तीर्थराज की ही उपमा दी गयी है जिससे सदा आनंद  और मंगल का उद्गम होता रहता  है.  गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित्र मानस में लिखा है

                              मुद मंगलमय संत समाजू , जो जग जंगम तीर्थराजू
       अर्थात संत समाज आनंद और मंगलमय  है  जो कि जगत में तीरथराज के समान ही है,

संत वास्तव में ऐसा व्यक्ति है जिसका अंत सुखद हो. अर्थात जिसने  जीवनभर ऐसे भाव, कर्म और विचारों का  आचरण किया हो जिससे मरने के बाद भी लोग उसे याद रखें और वह खुद भी सदा  अंत:करण में  तृप्त और संतुष्ट रहे.  संतों के समाज में ही  भाव-भक्ति, कर्म रहस्य और ज्ञान की ऐसी ऐसी बातें जानने को मिलती हैं कि लगता है आनंद सागर में ही गोते लगा लिए हों.जिसमे   स्नान कर  मन  निर्मल हो जाता है .
    
ब्लॉग जगत में आये मुझे एक महीना से कुछ कम समय  ही हुआ होगा. परन्तु जो मेरा अनुभव रहा 
वह बहुत ही सुखद  रहा . यूँ तो अच्छा बुरा सभी जगह मिलेगा , पर दैवयोग से मुझे जो दर्शन  हुआ उसे मै शुभ ही मानता हूँ .  यहाँ ज्ञान की बाते जानने को मिली  ,भाव और भक्ति का रस मिला और कर्म रहस्य के बारे में भी बहुत सी जानकारी मिली . मै अभी तक कुल चार  पोस्ट ही लिख पाया हूँ .इन पोस्टों पर जो भी टिप्पणिओं के रूप में वैचारिक सहयोग मुझे ब्लॉग जगत के सुधिजनो का मिला उससे मेरा मनोबल बढ़ा है. मैंने भी समय और सुविधा अनुसार अपने विचार अन्य सुधिजन के ब्लोग्स पर प्रस्तुत किये हैं  और बहुत ही सुंदर विचारों का आदान प्रदान  करने का मुझे मौका मिला. डॉ. दिव्या जी ने मेरी पोस्ट 'मो को कहाँ ढूंढता रे बन्दे' पर अति सुंदर विचार प्रस्तुत करते हुए बताया की हमारे अन्दर दो तरह की आवाजे होती हैं ,एक मन की और दूसरी आत्मा की .आत्मा की आवाज ही हमारा सदा कल्याण  करती है जो एक बार ही होती है

इस सम्बन्ध में  संतजनों और शास्त्र के आधारपर  मुझे जो जानने को मिला वह यह  है  कि जीवन में हम सदा आनंद को ही खोजते रहते हैं .एक प्रकार का आनन्द  तो वह है जो वास्तव में हो  न, पर अज्ञान के कारण  शुरू में   दिखलाई पड़ता हो और जिसका अंत अंततः दुःख ही निकलता हो. इस प्रकार के आनंद के मार्ग  को जीवन में अपनाना   ' प्रेय मार्ग' को अपनाना कहलाता  है . अर्थात जो मन को प्रिय लगे पर जिसका अंत कल्याणकारी नहीं होता. जैसे सिगरट ,शराब आदि पीना, व्यर्थ का वार्तालाप (chating) करना, आदि आदि .

आनंदका दूसरा मार्ग जो आत्मा के 'सत-चित-आनंद'  भाव से पोषित होता है उसे शास्त्रों में ' श्रेय मार्ग ' बतलाया गया है. इस मार्ग का अनुसरण करने से हो सकता है यह शुरू में  कष्ट प्रद  लगे पर अंत में यही मार्ग हमे निर्मल चिर आनंद प्राप्त कराता  है जो सैदेव हमारा कल्याण करता है .ऐसे ही श्रेय  मार्ग के  दर्शन की मांग अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से की थी. जिस कारण 'भगवद गीता' जैसे अनुपम और अलोकिक ज्ञान का प्रसाद जगत को मिल पाया .  अत: आनंद का चिंतन और अनुसरण  करते हुए हमें सदा सजग और ध्यान रख कोशिश करनी  चाहिए कि हम केवल 'श्रेय मार्ग' का ही अनुसरण करें जो हमारा निश्चित रूप से कल्याण करे . 'श्रेय मार्ग' की जानकारी हमें सत पुरुषों व सत शास्त्रों  के संग से  मिलती है .हम भाग्यशाली हैं कि आज के युग में  यह जानकारी  हमें  ब्लॉग जगत के माध्यम से भी  सहज में उपलब्ध हो सकती है बशर्ते हम ईमानदारी से कोशिश करे .यदि ब्लॉग जगत में संत समाज मिल जाए तो समझो साक्षात् तीर्थराज ही की उपलब्धि हो गयी. फिर तो कल्याण ही कल्याण है जीवन में.