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Monday, September 12, 2011

सीता जन्म -आध्यात्मिक चिंतन -४

मन में श्रद्धा के  'जोश' और बुद्धि में विश्वास के 'होश' से 'भवानी और शिव' की कृपा होने लगती है.
भक्त वही  है जो परम  आनंद से ,परम शान्ति और संतुष्टि  से मन और बुद्धि के माध्यम से किसी
भी  प्रकार से हृदय में स्थित परमात्मा से  जुड जाये. जो नहीं जुड पाता वह 'विभक्त' है, खंडित है,
अशांत  और अस्थिर  है. श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय ४   श्लोक ३९   में वर्णित है

                           श्रद्धावाँल्लभते  ज्ञानं    तत्पर:  संयतेन्द्रिय
                           ज्ञानं लब्ध्वा परां शांतिमचिरेणाधिगच्छ्ती 

अर्थात जो श्रद्धावान है, तत्पर है ,साधनपरायण है और इन्द्रियों को संयत करता है,उसी को परमात्मा या
परमानन्द का ज्ञान भी प्राप्त होता है,जिसको प्राप्त कर  वह अति शीघ्र परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है.
और जो विवेकहीन ,श्रद्धारहित व संशय युक्त है उनके लिए श्रीमद्भगवद्गीता में वर्णित किया गया है

                           अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च  संशयात्मा   विनश्यति 
                           नायं लोकोSस्ति  न परो न सुखं संशयात्मन :

विवेकहीन , श्रद्धा रहित और  संशय युक्त मनुष्य परमार्थ को नहीं पा सकता . वह  अवश्य ही  नष्ट
भ्रष्ट हो जाता है. ऐसे संशय युक्त मनुष्य के लिए न यह लोक है, न परलोक है  और न ही सुख है.


यूँ तो परमात्मा  और परमानन्द से अनेक प्रकार से जुड़ा जा सकता है,परन्तु ,शास्त्रों में मुख्य रूप
से चार प्रकार के भक्त बताये गए हैं जो मन और बुद्धि में श्रद्धा और विश्वास उपार्जित करते हुए
परमात्मा  से जुडने का प्रयत्न करते हैं. श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं:-

                          राम भगत जग चारि प्रकारा , सुकृति चारिउ अनघ उदारा.
                          चहू चतुर कहू नाम अधारा ,  ज्ञानी प्रभुहि बिसेष  पिआरा 

जग में राम के भक्त चार प्रकार के होते हैं.चारों ही पुण्यात्मा,पापरहित और उदार हैं.चारों ही चतुर हैं
जिनको परमात्मा के नाम जप का  आधार है.इन चारों प्रकार के भक्तों में 'ज्ञानी' भक्त  प्रभु को
विशेष प्यारा है. श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय ७  श्लोक १६  में इन चार प्रकार के भक्तों को निम्न
प्रकार से वर्णित किया गया है:-

                         चतुर्विधा भजन्ते मां जना: सुकृतिनोऽर्जुन
                         आर्तो  जिज्ञासुरर्थार्थी  ज्ञानी  च  भरतर्षभ

हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! उत्तम कर्म करनेवाले मुनष्य मुझे चार प्रकार से भजते हैं.
अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी.

आईये, उपरोक्त चार प्रकार के भक्तों को कुछ और विस्तार से जानने का प्रयत्न करते है,

१)अर्थार्थी भक्त:  ऐसा भक्त जिसको परमात्मा में यह श्रद्धा और विश्वास है कि परमात्मा ही  उसकी
                           हर  मनोकामना पूर्ण करने में समर्थ है.यद्धपि वह भी सद् कर्म करता रहता है,परन्तु
                           भक्ति करते हुए  उसका उद्देश्य अपने अर्थ यानि कामना की पूर्ति की तरफ रहता है.
                           इसीलिए यह भक्त अर्थार्थी कहलाता है. यानि मतलब सिद्ध करने के लिए भक्ति.
                           अर्थार्थी भक्ति, भक्ति की प्रारंभिक अवस्था मानी जा सकती है,जिसमे भक्त का
                           परमात्मा के प्रति ज्ञान अति अल्प   है,परन्तु,उसको परमात्मा में श्रद्धा  है.

२) जिज्ञासु भक्त: ऐसा भक्त जिसकी जब मनोकामनाएं पूर्ण होने लगतीं हैं,या किसी भी  अन्य कारण
                           से जब उसके हृदय में परमात्मा को जानने की यह तीव्र अभिलाषा व उत्कंठा जाग्रत व                   
                           बलवती हो जाती है कि जो परमात्मा समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करता है,जिसने यह
                           चराचर जगत बनाया है,वह कौन है, कैसा है, उसका स्वरुप क्या है,तभी वह सत्संग,
                           सद् शास्त्रों ,संतजनों का आश्रय ग्रहण कर परमात्मा को जानने का सुप्रयत्न करता  है.

३) आर्त भक्त :    ऐसा भक्त जिसने जीवन में बहुत दुःख और कष्ट पाए हैं.संकटों में घिरा होने के कारण
                          अति कातर,दीन और आर्त होकर भगवान से जुड जाता है.उसे पूरी श्रद्धा और विश्वास है
                          कि परमात्मा ही उसके कष्टों का निवारण कर सकते है. उसका विश्वास  और सभी ओर से
                          उठ चुका होता है.जैसे पौराणिक  महाभारत की कथानुसार चीर-हरण के समय द्रौपदी
                          ने आर्त होकर  'श्रीकृष्ण' को पुकारा था.

४) ज्ञानी भक्त:  ऐसा भक्त जिसे परमात्मा के सम्बन्ध  में  सम्पूर्ण तत्व-बोध हो जाता है,सम्यक ज्ञान
                        हो जाता है,उसकी कोई जिज्ञासा  बाकी नहीं रहती.जिसकी अपनी कोई भी मनोकामना
                        नहीं रहती.जो परमात्मा को  आनंद और  प्रेम स्वरुप जानकर नित्ययुक्त हो  प्रेमानन्द
                        में ही मग्न रहता है,पूर्ण  तृप्त  और परम शान्ति को पा चुका होता है.जिसका अंत:करण
                        इतना सबल और सुस्थिर हो जाता है कि सुख - दुःख उसके  लिए कोई माने नहीं रखते.

चारों प्रकार के भक्तों में,ज्ञानी भक्त के विषय में श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय ७ के श्लोक १७ व १८  में
कहा गया है:-
                       तेषां   ज्ञानी  नित्ययुक्त   एकभक्तिर्विशिश्यते
                       प्रियो  हि  ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं  स   च   मम  प्रिय:
                       उदारा:  सर्व  एवैते  ज्ञानी    त्वात्मैव  मे   मतम् 
                       आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् 

उनमें ( चारों प्रकार के भक्तों में ) मुझे में एकीभाव से स्थित अनन्य प्रेमभक्ति वाला ज्ञानी भक्त अति
उत्तम है,  क्यूंकि मुझको तत्व से जाननेवाले ज्ञानी को मैं अत्यंत प्रिय हूँ  और  वह ज्ञानी मुझे अत्यंत
प्रिय है. ये (चारों) भक्त  उदार हैं, परन्तु ज्ञानी तो साक्षात मेरा स्वरुप ही  है,ऐसा मेरा मत है. क्यूंकि ज्ञानी
की गति केवल मेरे में ही है,मेरे में ही वह मन ,प्राण और बुद्धि को लगाये रखता है.उत्तम गतिस्वरूप
ज्ञानी भक्त मुझमें ही अच्छी प्रकार से स्थित है,यानि वह भी आनंदस्वरूप ही है.

जब हम बिना मन और बुद्धि को परमात्मा में लगाए ,बिना  श्रद्धा और विश्वास के परमात्मा की
भक्ति का ढोंग करते हैं,ढोंगी का भेष धारण करते हैं  तो श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार मिथ्याचारी
कहलाते  है.आज समाज में अधिकतर मिथ्याचारियों  का ही बोलबाला है. जिससे आम बुद्धिजीवी
का विश्वास संतों से ही नहीं ,परमात्मा तक से  भी  उठता  चला जा रहा  है.बुद्धिमान ढोंगी के   भेष
और सच्ची  भक्ति का अंतर समझ जाते है,कहा गया है ;

                      भक्ति कठिन अति दुर्लभ, भेष सुगम नित होय 
                      भक्ति जु न्यारी भेष  से , यह  जानै  सब   कोय 

मिथ्याचार को छोड़ कर यदि  हम उपरोक्त   चार प्रकार के भक्तों के बारे में सही प्रकार से जाने तो
हम यह तय कर सकते हैं कि  अभी हमारी भक्ति किस स्तर की है.भक्त बनने से पहले हमें हर हालत
में सुकृत तो करने ही होंगें. बिना सुकृत किये हम किसी प्रकार से भी भक्त कहलाये जाने के अधिकारी
नहीं हो सकते हैं.

यदि हम अभी अर्थार्थी या आर्त भक्त की श्रेणी में  हैं तो   परमात्मा को जानने की तीव्र उत्कंठा जगाकर
जिज्ञासु बनने का प्रयत्न भी  कर सकते हैं.जिज्ञासु भक्त ही एक न एक दिन राम कृपा से ज्ञानी भक्त
हो जायेगा इस विश्वास से जीवन में आगे बढ़ने का प्रयत्न करें  तो ही जीवन का  वास्तविक सदुपयोग है
संत कबीरदास जी  कहते हैं:-

                    भक्ति बीज पलटे  नहीं ,जो जुग जाये अनन्त 
                    ऊँच नीच  घर अवतरै,   होय   संत   का   संत 

अर्थात की हुई भक्ति का बीज कभी भी निष्फल नहीं होता. चाहे अनन्त युग बीत जाएँ ,भक्तिमान जीव
ऊँच  नीच माने गए चाहे किसी भी वर्ण या जाति में उत्पन्न हो,प्रारब्ध वश चाहे किसी भी योनि में उसे जाना
पड़े पर अंततः वह संत ही रहता है.  उसका अंत हमेशा अच्छा ही होता है.अर्थात उसकी परम गति हो
उसे परमानन्द की प्राप्ति होकर रहती है.

सीता जन्म आध्यात्मिक चिंतन की पिछली तीनों पोस्टों पर आप सुधिजनों द्वारा की गई टिप्पणियों
से हृदय में इस आशा और विश्वास का सुखद  संचार होता है कि हम सभी मिथ्याचार को छोड़कर  अपने
हृदय में भक्ति  जिज्ञासा   की जोत  प्रज्जवलित करने में जरूर जरूर सफल होंगें.

यह पोस्ट भी कुछ  लंबी हो गई है.इसलिये इस बार बस यहीं समाप्त करता हूँ.आप सुधिजनों ने मेरी
इस लंबी पोस्ट को पढ़ने का जो कष्ट उठाया है  ,इसके लिए मैं आपका हृदय से आभारी हूँ.मैं आप सभी
से यह भी अनुरोध करूँगा कि विषय को भली प्रकार से समझने के लिए आप समय मिलने पर  मेरी
पिछली पोस्टों का अवलोकन भी जरूर करते रहें.

अगली पोस्ट में, यदि हो सका तो नाम जप और 'सीता लीला'  पर  कुछ और आध्यात्मिक चिंतन
करने की कोशिश करूँगा. आशा है आप सब सुधिजन अपने सुविचारों को प्रकट कर   मेरा उत्साह
वर्धन करते रहेंगें.
        

Saturday, August 20, 2011

सीता जन्म -आध्यात्मिक चिंतन -३

सीता पवित्र पावन है, मनोहारी,सुकोमल  और अत्यंत सुन्दर है, दुर्लभ भक्ति स्वरूपा है, समस्त
चाहतों की जननी है. सीता का नाम जन जन में प्रचलित है, जो राम से पहले ही  बहुत आदर  व
सम्मान के  साथ लिया जाता  है.बहुत प्राचीन समय से  अनेक  घरों में  बच्चियों का नाम सीता,
जानकी या वैदेही के  नाम पर  रखा जाता रहा है. अत: यह अफ़सोस करना कि लोग अपनी बच्चियों
का नाम सीता के नाम पर नहीं रखना चाहते नितांत निराधार है. सीता ,राधा, मीरा   आदि का नाम
स्मरण करते ही हृदय में भक्ति का उदय होता है. बहरहाल किसी भी प्रकार के विवाद को अलग
रखते हुए इस पोस्ट में भी मेरा  उद्देश्य 'सीता जन्म' के  आध्यात्मिक चिंतन को आगे बढ़ाना  है.

मेरी पिछली पोस्ट 'सीता जन्म -आध्यात्मिक चिंतन -२' में  हमने यह जाना था  कि

'सीता जी यानि भक्ति  ही जीव जो परमात्मा का  अंश है को अंशी अर्थात परमात्मा से जोड़ने में 
समर्थ हैं वे हृदय में आनंद का 'उदभव' करके उसकी 'स्थिति' को बनाये रखतीं हैं.हृदय की समस्त 
नकारात्मकता का 'संहार'  करके  कलेशों  का हरण कर लेतीं  हैं और सब प्रकार से जीव का कल्याण 
ही  करती रहतीं  हैं.


सीता जन्म अर्थात भक्ति का उदय हृदय में कैसे हो , आईये  इस बारे में थोडा मनन करने  का प्रयास करते हैं.
गोस्वामी तुलसीदास जी श्री रामचरितमानस में लिखते हैं :-


             बिनु बिस्वास भगति नहि, तेहि बिनु द्रवहिं न रामु 
             राम  कृपा  बिनु  सपनेहुँ , जीव  न  लेह   विश्रामु 


अर्थात बिना विश्वास  के भक्ति नहीं होती, भक्ति के बिना श्री राम जी पिघलते नहीं यानि 'राम कृपा'
नहीं होती और श्री राम जी की कृपा के बिना जीव स्वप्न में भी शान्ति नहीं पा सकता.


'सत्-चित-आनंद' या राम  में विश्वास होना ,अर्थात हृदय मे ऐसी पक्की धारणा का होना कि जीवन में असली 
आनंद स्थाई चेतनायुक्त आनंद(सत्-चित-आनंद) ही   है,जिसको पाना संभव है और जिसका  निवास
भी  हमारे हृदय में ही है,अत्यंत आवश्यक है.


इसके लिए गोस्वामी तुलसीदास जी श्रीरामचरितमानस के प्रारम्भ में ही यह प्रार्थना करते हैं :-
   
             भवानी  शंकरौ   वन्दे             श्रद्धा विश्वास रुपिनौ 

             याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धा: स्वान्त:स्थमीश्वरम  


मैं भवानी जी और शंकर जी की वंदना करता हूँ . (क्यूंकि) भवानी जी 'श्रृद्धा' और शंकर जी 'विश्वास' का ही 
स्वरुप हैं. श्रद्धा- विश्वास के बिना सिद्ध जन भी अपने अंत:करण में स्थित ईश्वर को नहीं देख सकते. 


मुझे बहुत अफ़सोस होता है जब ब्लॉग जगत में मैं यह पाता हूँ कि कुछ लोग 'शिव-पार्वती' अथवा 'शिवलिंग'
के बारे में  बिना जाने ही दुष्प्रचार और मखौल  करने में लगे हुए  हैं.उनकी क्षुद्र सोच पर मुझे हँसी ही आती है.
हमारे यहाँ अध्यात्म में 'प्रतीकों' का सहारा लिया जाता है,जैसा कि आज के विज्ञान में भी किया जाता है,
जैसे पानी को 'H2O' क्यूँ दर्शाते हैं और  H2O  का मतलब पानी में  दो भाग हाइड्रोजन व एक भाग
ओक्सीजन का होना है,यह एक वैज्ञानिक अच्छी प्रकार से जानता है, परन्तु ,एक साधारण आदमी 
को बिना जाने न तो H2O का मतलब समझ आयेगा न ही वह यह विश्वास करेगा कि पानी दो गैसों
हाइड्रोजन व ओक्सिजन से मिलकर बना है. इसके लिए सर्वप्रथम  तो उसे 'विज्ञान' पर श्रद्धा रखनी
होगी. श्रद्धा के कारण ही वह विज्ञान को समझने का जब प्रयत्न करेगा तभी उसे कुछ  कुछ
समझ उत्पन्न हो सकेगी. जैसे जैसे उसका ज्ञान और अनुभव बढ़ता जायेगा, तैसे तैसे उसे यह
'विश्वास' भी उत्पन्न होता जायेगा कि  हाँ पानी दो गैसों से मिलकर ही बना है.प्रतीक गुढ़ रहस्यों को
आसानी से समझने के माध्यम हैं. भवानी 'श्रद्धा' का प्रतीक हैं और शंकर जी 'विश्वास' का.

'श्रद्धा'  यानि भवानी जी शक्ति है जिसके द्वारा   जीव सत्संग का अनुसरण कर  निष्ठापूर्वक प्रयास
करता है  और सद्ज्ञान प्राप्ति का अधिकारी हो  पाता है. ज्ञान की  प्राप्ति पर  विश्वास होता  है.
यह विश्वास यानि 'शिव' ही  कल्याणस्वरुप  है जो मन के सभी  संशयों के विष को पी डालता है ,
जिससे जीव एकनिष्ठ हो परमात्मा का ध्यान कर पाता है.और परमात्मा के ध्यान से जैसे जैसे हृदय
में शान्ति और आनंद का अनुभव होने  लगता है, तैसे तैसे शान्ति और आनंद की  प्राप्ति की चाहत
व  तडफ भी  हृदय में नितप्रति बलबती होकर हृदय में  'भक्ति' का उदभव करा देती  है.
'भक्ति' के लिए राम कृपा और सत्संग  की आवश्यकता है.सत्संग और 'राम कृपा' के सम्बन्ध
में मैंने अपनी पोस्ट 'बिनु सत्संग बिबेक न होई' में  लिखा है.सुधिजन चाहें तो मेरी इस पोस्ट का
भी अवलोकन कर सकते हैं,जो कि मेरी लोकप्रिय पोस्टों में से एक है.

भक्ति के बारे में गोस्वामीजी  लिखतें हैं :-
             
                 भक्ति सुतंत्र सकल गुन  खानी ,बिनु सत्संग न पावहि प्रानी
                 पुण्य पुंज बिनु मिलहि न संता, सतसंगति संसृति कर अंता


भक्ति स्वतंत्र है और सभी सुखों की खान है . परन्तु ,सत्संग  के बिना प्राणी इसे पा नही सकता.
पुण्य समूह के बिना संत नहीं मिलते और सत्संगति से ही जन्म-मृत्यु  रूप 'संसृति' का अंत हो 
पाता है.

क्यूंकि सत्संगति से ही  'श्रद्धा' , 'विश्वास' के बारे में  सही सही जानकारी होती है.वर्ना  अज्ञान
पर आधारित अंध श्रद्धा तो  जीव के पतन का कारण भी हो सकती है.यदि चाहत 'राम' के बजाय संसार
की होगी तो वह भक्ति की जगह वासना बन  'कारण शरीर' का निर्माण करेगी ,जिसके फलस्वरूप जैसा
कि मैंने अपनी पिछली पोस्ट 'सीता जन्म  आध्यात्मिक चिंतन -१' में बताया था ,जन्म मरण (संसृति)
के  बंधन का निर्माण होगा.

श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय १७ (श्रद्धा त्रय विभाग योग) में श्रद्धा के 'सत', 'रज' और 'तम' गुणी स्वरूपों
की विवेचना की गई है.सुधिजन चाहें तो 'श्रद्धा' के बारे में और अधिक जानने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता
का अध्ययन कर सकते हैं. श्रद्धा पूर्वक मनन करने से ही   गुढ़  रहस्य प्रकट हो पाते हैं.
वर्ना लोग बिना पढ़े और जाने ही 'अश्रद्धा' के कारण  अपनी भिन्न भिन्न विपरीत धारणा
भी बना लेते हैं.'श्रद्धा' और 'विश्वास' राम भक्ति रुपी मणि को पाने के सुन्दर साधन हैं.

राम भक्ति एक अक्षय मणि के समान है .यह जिसके हृदय में बसती  है उसे स्वप्न में भी लेशमात्र
दुःख नहीं होता. जगत में वे ही मनुष्य चतुर शिरोमणि हैं जो इस भक्ति रुपी मणि के लिए भलीभाँती
यत्न करते हैं.तुलसीदास जी इस बारे में लिखते हैं:-

                राम भगति मनि  उर बस जाके, दुःख लवलेस  न सपनेहुँ ताके 
                चतुर शिरोमनि  तेइ जग माहीं ,जे मनि  लागि सुजतन कराहीं 


इस  पोस्ट  को विस्तार  भय से अब यहीं समाप्त करता हूँ. अगली पोस्ट में चार प्रकार के भक्तों और
'सीता लीला' के ऊपर कुछ और चिंतन का प्रयास करेंगें.

मुझे यह जानकर अत्यंत हर्ष होता है कि सीता जन्म आध्यात्मिक चिंतन  की मेरी पिछली दोनों
पोस्ट सुधीजनों द्वारा पसंद की गयीं हैं. उनकी सुन्दर सारगर्भित टिप्पणियों  से मैं निहाल हो जाता
हूँ.मैं सभी सुधिजनों का इसके लिए हृदय से आभारी हूँ. मैं सभी पाठकों से अनुरोध करूँगा कि मेरी इस
पोस्ट पर भी अपने अमूल्य विचार अवश्य प्रस्तुत करें.

Wednesday, July 20, 2011

सीता जन्म -आध्यात्मिक चिंतन -२

किसी भी  चाहत की उत्पत्ति आनंद प्राप्ति के लिए   होती है. यह अलग बात है कि उस  चाहत की
पूर्ति पर आनंद मिले या न मिले. अथवा जो आनंद मिले वह स्थाई न होकर अस्थाई ही रहे.
जैसे जैसे हमारी सोच व अनुभव परिपक्व होते जाते  है ,हम अस्थाई आनंद की अपेक्षा स्थाई
आनंद की चाहत को अधिक महत्व देने लगते हैं.वास्तव में  चाहत  माया  का ही रूप है.जीव और
ईश्वर के बीच ईश्वर को पाने की चाहत अर्थात 'श्री ' (सीता) जी किस प्रकार से शोभा पाती हैं इसका
वर्णन  करते  हुए गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं :

            उभय बीच श्री सोहइ  कैसी , ब्रह्म जीव बिच माया जैसी.

जैसा कि मैंने अपनी पिछली  पोस्ट में कहा कि 'सीता जन्म' हृदय स्थली में 'सत्-चित-आनंद' को पाने
की  सच्ची चाहत का उदय होना  है.अर्थात ऐसी चाहत जो हमे 'स्थाई चेतन आनंद' की प्राप्ति करा सके,
जिस  आनंद को   हमारे शास्त्रों में 'सत्-चित-आनंद' या परमात्मा के नाम से पुकारा गया है.
'सीतारूपी' चाहत अत्यंत दुर्लभ है जो आत्मज्ञान  के अनुसंधान व खोज  का ही  परिणाम है,सीताजी
भक्ति स्वरूपा   हैं, जो   समस्त चाहतों की 'जननी' , अत्यंत सुन्दर , श्रेय व कल्याण करनेवाली है.
सीता जी की सुंदरता का निरूपण करते हुए गोस्वामी तुलसीदासजी लिखते हैं :-

             सुंदरता  कहुं सुन्दर करई, छबि गृहं दीपसिखा जनु  बरई
             सब उपमा कबि  रहे जुठारी , केहिं  पटतरौं  बिदेहकुमारी 


सीताजी की शोभा, सुंदरता को भी सुन्दर करनेवाली है.वह ऐसी मालूम होती हैं मानो सुन्दरता रुपी घर 
में दीपक की लौं जल रही हो.सारी उपमाओं को तो कवियों ने झूंठा कर रखा है. मैं जनक नंदनी श्री 
सीताजी की किससे  उपमा दूँ .

कहते हैं सीताजी का अवतरण तब हुआ था जब  वैदेह राजा जनक ने प्रजा के हितार्थ वृष्टि कराने
हेतू भूमि में हल चलाया था और हल की नोंक भूमि में गड़े एक घड़े से टकराई थी.उस घड़े में  से ही एक
अति सुन्दर सुकोमल कन्या प्रकट हुई,जिसका नाम हल के नुकीले भाग के नाम पर "सीता" रखा गया.
जनक जी ने इस कन्या को अपनी पुत्री के रूप में अपनाया इसलिये उनका नाम "जानकी" या "वैदेही"
भी कहलाया. राजा जनक पूर्ण आत्मज्ञानी हैं  जिन्हें अपनी देह में भी किंचित मात्र आसक्ति नहीं है .
इसीलये उन्हें 'वैदेह' कहते हैं. वे अपने  आत्मस्वरूप में सदा स्थित हो आत्म तृप्त रहते हैं.उन्हें कर्म
करने की कोई आवश्यकता नहीं है तो भी लोकहितार्थ  वृष्टि हेतू पृथ्वी पर हल चलाने का 'कर्म योग'
करते हैं. जिसके फलस्वरूप 'सीता'  यानि भक्ति का प्रादुर्भाव होता है.वृष्टि का अभिप्राय यहाँ
आनंद से ही है.

उपरोक्त कहानी से यह समझ में आता है कि भले ही व्यक्ति पूर्ण आत्मज्ञानी भी हो जाये,परन्तु
जनकल्याण के लिए उसे 'जमीन में हल चलाने ' अर्थात निरंतर 'कर्मयोग'  की भी आवश्यकता
है, जिससे   'भक्तिरुपी' सीताजी   का उदय हो  पाए और  चहुँ और आनंद की वृष्टि  हो सके. हल की
नोंक उस आत्मज्ञानी व्यक्ति की प्रखर बुद्धि का प्रतीक है जिससे वह परम चाहत  'सीता' जी की खोज
का कार्य संपन्न कर् पाता है.

सीता जी  'सत्-चित-आनंद' परमात्मा यानि 'राम' का ही  वरण करतीं  हैं. राम को 'राम को पाने की
चाहत' यानि सीताजी  अत्यंत प्रिय है. इसलिये इनको 'रामवल्लभाम'  भी कहते हैं.सीताजी की वंदना
करते हुए  श्रीरामचरितमानस के शुरू में ही  गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं :-

                     उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं          क्लेशहारिणीम
                     सर्वश्रेयस्करीम सीतां नतोSहं      रामवल्लभाम

जो उत्पत्ति ,स्थिति और संहार करनेवाली हैं, कलेशों का हरण करनेवाली  हैं, सब प्रकार से कल्याण 
करनेवाली हैं,श्री राम जी की प्रियतमा हैं,उन सीता जी को मैं नमस्कार करता हूँ.


सीता जी यानि भक्ति  ही जीव जो परमात्मा का  अंश है को अंशी अर्थात परमात्मा से जोड़ने में समर्थ हैं
वे हृदय में आनंद का 'उदभव' करके उसकी 'स्थिति' को बनाये रखतीं हैं.हृदय की समस्त नकारात्मकता
का 'संहार'  करके  कलेशों  का हरण कर लेतीं  हैं और सब प्रकार से जीव का कल्याण ही  करती रहतीं  हैं.

.ऐसी 'भक्ति' माता  सीता जी का  मैं हृदय से  नमन करता हूँ .

                 सीय राममय सब जगजानी, करउ प्रनाम जोरि जुग पानी 


अगली पोस्ट में हम 'सीताजी' व उनकी लीला के  आध्यात्मिक चिंतन करने का एक और प्रयास करेंगें.

मैं सभी सुधिजनों का हृदय से आभारी हूँ जिन्होंने मेरी पिछली पोस्ट 'सीता जन्म -आध्यात्मिक चिंतन-१'
पर अपनी बहुमूल्य टिप्पणियाँ देकर मेरा उत्साहवर्धन किया है . जिससे यह पोस्ट मेरी लोकप्रिय पोस्टों
(Popular Posts) में अति शीघ्र ही चौथे स्थान पर आ गई है.

मैं आशा करता हूँ कि इस पोस्ट पर भी सुधिजनों का प्यार और कृपा  मुझ पर बनी रहेगी.




Wednesday, June 29, 2011

सीता जन्म -आध्यात्मिक चिंतन -१

चाहत या आरजू का जीवन में बहुत महत्व है.हमारी  अनेक प्रकार की चाहतें हो सकतीं हैं, जो  जीवन
के स्वरुप को बदलने में सक्षम हैं.  वासनारूप होकर जब    चाहत   अंत:करण  में वास  करने लगती
है तो  हमारे 'कारण शरीर' का भी  निर्माण  करती रहती है.

'कारण शरीर' हमारी स्वयं की वासनाओं से निर्मित है, जिसके कारण  मृत्यु  उपरांत हमें नवीन स्थूल
व सूक्ष्म  शरीरों  की प्राप्ति होती है.यदि वासनाएं सतो गुणी हैं अर्थात विवेक,ज्ञान  और प्रकाश की
ओर उन्मुख हैं  तो 'देव योनि ' की प्राप्ति हो सकती है.  यदि  रजो गुणी अर्थात अत्यंत क्रियाशीलता,
चंचलता  और  महत्वकांक्षा से ग्रस्त हैं तो  साधारण 'मनुष्य योनि'. की और यदि  तमो गुणी अर्थात
अज्ञान,प्रमाद हिंसा आदि से  ग्रस्त  हैं  तो 'निम्न' पशु,पक्षी, कीट-पतंग आदि की 'योनि'प्राप्त हो
सकती है. इस प्रकार विभिन्न प्रकार की वासनाओं से विभिन्न प्रकार की योनि प्राप्त हो
सकती है. जो हमारे शास्त्रों  अनुसार ८४ लाख बतलाई गई हैं.

उदहारण स्वरुप यदि किसी की चाहत यह हो कि जिससे उसको कुछ मिलता है ,उसको  वह स्वामी  
मानने लगे और  उसकी चापलूसी करे,कुत्ते  की  तरहं उसके आगे पीछे दुम हिलाए.  जिससे उसको
नफरत हो या जो उसे पसंद  न आये,  उसपर वह जोर का   गुस्सा करे ,कुत्ते की तरह भौंके  और जब
यह चाहत'उसकी अन्य चाहतों से सर्वोपरि होकर  उसके अंत:करण में प्रविष्ट  हो वासना रूप में  उसके
 'कारण शरीर' का निर्माण करे ,तो   उस व्यक्ति को अपनी ऐसी चाहत की पूर्ति  के लिए 'कुत्ता योनि'
में भी जन्म लेना पड़ सकता है. इसी  प्रकार जो बात-बिना बात अपनी अपनी कहता रहें यानि बस
टर्र टर्र ही   करे ,मेंडक की तरह कुलांचें भी  भरे तो वह  'मेंडक' बन सकता है..क्योंकि ऐसी वासनायें
अज्ञान ,प्रमाद से ग्रस्त होने के कारण 'तमो गुणी'  ही  है  जो पशु योनि की कारक है.

चाहत यदि सांसारिक है तो  संसार में रमण होगा. पर  चाहत परमात्मा को पाने की हो  तो परमात्मा से
मिलन होगा.इसलिये अपनी चाहतों के प्रति हमें अत्यंत जागरूक व सावधान रहना चाहिये.किसी भी
चाहत को विचार द्वारा पोषित किया जा सकता है.विचार द्वारा ही चाहत का शमन भी किया जा सकता है.
यदि चाहत सच्ची और प्रगाढ़ हो तो अवश्य पूरी  होती है.गोस्वामी  तुलसीदास जी रामचरितमानस में
सच्ची चाहत और स्नेह के बारे में लिखते हैं:-

                          जेहि  कें जेहि पर सत्य सनेहू, सो तेहि  मिलइ  न कछु संदेहू 


वास्तव में 'सीता जी' का स्वरुप रामचरितमानस व अन्य ग्रंथों में प्रभु श्री राम की 'भक्ति' स्वरूपा
माना गया है.जो  राम अर्थात 'सत्-चित-आनंद' को पाने की सर्वोतम  और अति उत्कृष्ट  चाहत ही है.
ऐसी चाहत इस पृथ्वीलोक में  अति दुर्लभ और अनमोल है, जो  मनुष्य को सभी वासनाओं  से मुक्त
कर उसके 'कारण शरीर' का अंत  कर सत्-चित-आनंद' परमात्मा से मिलन कराने में समर्थ है.

भगवान कृष्ण  श्रीमद्भगवद्गीता  के अध्याय १२ (भक्ति योग ) के   श्लोक ९  में कहते हैं
                   
                               अथ चित्तं  समाधातुं  न शक्रोषी मयि स्थिरम
                              अभ्यासयोगेन ततो  मामिच्छाप्तुम धनञ्जय


यदि तू अपने मन को मुझमें अचल स्थापन करने के लिए समर्थ नहीं है तो हे अर्जुन! तू अभ्यास रूप 
योग के द्वारा मुझको प्राप्त होने के लिए 'इच्छा' कर.


परमात्मा को पाने की 'इच्छा'  अन्य सभी  इच्छाओं का अपने में  समन्वय और शांत करने  में समर्थ है,
जो गंगा की तरह अन्ततः परमात्मा रुपी समुन्द्र में मिल जाती  है.इसीलिए अभ्यासयोग (परमात्मा
का मनन,जप,ध्यान आदि) बिना परमात्मा की प्राप्ति की सच्ची इच्छा के अधूरा ही है.परमात्मा को पाने  के
लिए अभ्यासयोग के साथ साथ  बुद्धि के सद् विचार द्वारा ऐसी चाहत का ही निरंतर पोषण करते
रहना चाहिये.

परमात्मा की सच्ची  चाहत, प्रेम  या  भक्ति पृथ्वी पुत्री 'सीता' जी ही  है.  जिन्हें  'आत्मज्ञानी' विदेह
जनक जी ने भी अपनी पुत्री के रूप में अपनाया ,जो  करुणा निधान  परमात्मा को अत्यंत प्रिय है.ऐसी
भक्ति स्वरूपा जानकी  जी जगत की जननी हैं ,क्यूंकि सभी चाहतों का  इनमें विलय हो जाता है. उन्हीं के
चरण कमलों  को मनाते हुए    गोस्वामी तुलसीदास जी निवेदन करते  हैं  कि वे (जानकी जी)  उन्हें
निर्मल सद् बुद्धि प्रदान करें , जो  प्रभु  'सत्-चित-आनंद' की  प्राप्ति कराने में सहायक  हो.

                               जनकसुता जग जननि  जानकी,अतिशय प्रिय करुनानिधान की 
                               ताके जुग पद  कमल मनावऊँ,  जासु कृपा  निरमल  मति पावउँ 


हृदय स्थली  में आत्मज्ञान के साथ साथ परमात्मा को पाने की सच्ची चाहत का उदय हो , यही
वास्तविक रूप से 'सीता जन्म' है.ऐसी  सच्ची चाहत ही निर्मल मन व बुद्धि प्रदान कर सकती है,
जिसके बिना परमात्मा को पाना असम्भव है.

'सीता' जी सर्व श्रेय  व  कल्याण  करने वालीं  हैं. अगली पोस्ट में 'सीता' जी के स्वरुप का हम और भी
मनन व चिंतन करेंगें.             

Saturday, May 21, 2011

रामजन्म - आध्यात्मिक चिंतन -४




यह मेरे लिए अति आनंद की बात है कि प्रिय सुधिजनों  ने  'रामजन्म -आध्यात्मिक चिंतन' पर
प्रकाशित मेरी पिछली तीनों पोस्टों  का अपनी आनंदपूर्ण टिप्पणियों से भरपूर स्वागत किया है.
देवेन्द्र भाई का कहना है कि 'संगम सरयू स्नान कर धवल व पवित्र हो जाता है. 
भाई अरविन्द मिश्रा जी कहते हैं कि 'अब सरयू भी सहज ध्यानाकर्षण की अधिकारणी हो
जाती है.'  हालाँकि मेरी  पिछली पोस्ट 'रामजन्म-आध्यात्मिक चिंतन -३' में सरयू  का निरूपण
आत्म-ज्ञान रुपी सरिता से किया  गया है, फिर भी रूचि और प्रसंग को देखते हुए इस पोस्ट में
हम 'सरयू' जी  पर विचार करने की और कोशिश करते हैं.

आईये,  मेरी  पिछली पोस्ट 'रामजन्म- आध्यात्मिक चिंतन-३'  में वर्णित  रामचरित्र मानस की
निम्न पंक्तियों का स्मरण करते हुए आगे बढते हैं

             "बंदउ  अवधपुरी  अति   पावनि,  सरजू  सरि  कलि   कलुष  नसावनि"

अवधपुरी की वंदना  ऐसी अति पवित्र पुरी के रूप में की गई है जहाँ 'सरयू' जैसी सरिता बह रही
है जो कलियुग की कलुषता का नाश करनेवाली है .रामचरितमानस में सरयू के बारे में यह भी
लिखा गया है कि

                       उत्तर दिसि सरजू बह निर्मल जल गंभीर
                       बाँधे  घाट मनोहर   स्वल्प  पंक  नहिं तीर

अर्थात अवधपुरी की उत्तर दिशा में सरयू बह रही हैं जिसका जल निर्मल और गहरा है.
मनोहर घाट बंधे हुए है, किनारे पर जरा भी कीचड़ नहीं है.

यह देखा गया है कि जब कोई नदी या सरिता जो  निरंतर प्रवाहित होती है, जिसका जल
शुद्ध ,  पेय  व कल्याणकारी होता है, जिसपर स्नान आदि करने के लिए सुन्दर घाट निर्मित
किये जा सकते हैं  व जिसके किनारे कीचड़ आदि से   मुक्त होते हैं  तो उस नदी  के
आस पास संपन्न नगर व पुरी भी बस जाते हैं.

अवधपुरी हृदय में स्थित  एक ऐसी ही संपन्न पुरी है जहाँ समस्त दैवीय संपदा जैसे 'अभय
यानि मृत्यु आदि समस्त भयों का अभाव, अंत:करण की निर्मलता,  उत्तम कर्मों का आचरण ,
क्रोध का सर्वथा अभाव, दया, अहिंसा आदि सद्गुणों का निरंतर विकास होता रहता  हैं. यह सब
विकास इसीलिए संभव होता है क्यूंकि अवधपुरी की उत्तर दिशा में 'आत्म ज्ञान' रुपी सरयू
नदी निरंतर बहती रहती है. उत्तर दिशा 'परिपक्वता'  का प्रतीक है. यानि 'आत्मज्ञान' केवल
कोरा  या थोथा नहीं  बल्कि  गहन अनुसंधान और अनुभव  पर आधारित है जिसमें स्वल्प भी
अज्ञान रुपी कीचड़ का लेश मात्र  नहीं है.

अपनी आत्मा का ज्ञान हमें भय मुक्त करने में सर्वथा समर्थ है. जब  मैं अपने शरीर को केवल
वस्त्र मानकर स्वयं को परमात्मा का अंश 'सत्-चित-आनंद' मानता हूँ जो नित्य,अजर,अमर
अवध,आनंदस्वरूप है  और निरंतर यही 'command'  अपने मस्तिष्क रूपी कंप्यूटर को देता रहता
हूँ, , तो मेरे हृदय में नकारात्मकता का शमन हो सकारात्मकता व आनंद का संचार होने
लगता है.जैसा कि भगवद्गीता (अध्याय २ श्लोक २२ ) में भी  निम्न प्रकार से वर्णित है

                              वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
                              नवानि गृह्णाति नरोSपराणी
                              तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
                              न्यन्यानि संयाति नवानि देही
अर्थात जैसे हम  शरीर के पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करते हैं,वैसे
ही हमारी आत्मा पुराने शरीर को त्यागकर दूसरे नए शरीर को प्राप्त होता है.

यह देह भी  हमेशा एकसा नहीं रहता.पहले बचपन, बचपन की मृत्यु हो जवानी , जवानी की 
मृत्यु हो बुढ़ापा,और फिर देह  ही अंततः मृत्यु को प्राप्त हो जाता है.
वास्तव में आत्मा के तीन शरीर हैं (१) स्थूल या  पंच भूत से निर्मित  भौतिक शरीर जिसकी
मृत्यु होती है और यही नाशको प्राप्त होता है (२) सूक्ष्म शरीर जो मन,बुद्धि,अहंकार से
निर्मित है (३) कारण शरीर जो सकाम  कर्मों के परिणाम स्वरुप संचित वासनाओं के रूप में
निर्मित  है.

स्थूल शरीर  के विनाश होने पर 'सूक्ष्म' और 'कारण' शरीर हमारी आत्मा के साथ ही  नवीन
स्थूल शरीर की प्राप्ति की  ओर अग्रसर हो जाते हैं ,जो हमारी संचित वासनाओं अर्थात
' कारण शरीर' के अनुरूप ही  मिला करता है.'तमोगुणी' वासनाओं  से निम्न योनि(कीट,पतंग,
पशु,पक्षी आदि) ,'रजोगुणी' वासनाओं से साधारण मनुष्य योनि और 'सतोगुणी' वासनाओं से
उच्च मनुष्य योनि(संत,महापुरुष आदि) जिसे देव योनि भी कहते हैं प्राप्त होती हैं.इन वासनाओं
का   सर्जन  और विसर्जन  हम अपने जीवन काल में अपने कर्म,भाव और विचारों के द्वारा
करते रहते हैं.जिस जिस प्रकार की वासनाएं अर्जित होती जातीं हैं,वैसा वैसा  ही  'कारण शरीर '
का  निर्माण भी  होता  जाता है. 'कारण शरीर ' के आधार पर ही फिर  'सूक्ष्म' शरीर  व 'स्थूल'
शरीर का निर्माण होता है . परन्तु, हमारा  मरण  कभी नहीं होता. जन्म से पहले  और मृत्यु के
पश्चात भी  हम आत्मा रूप में हमेशा विद्यमान रहते है.

यदि  अपने जीवन काल में ही मैं यह आत्मज्ञान   प्राप्त करलूँ कि न मैं स्थूल शरीर हूँ,
न ही सूक्ष्म और न ही कारण शरीर बल्कि ये मेरे केवल  वस्त्र मात्र हैं जिनको  मैं अपने
कर्म,विचार और भावों  के द्वारा बदलता रहता हूँ,  मेरा वास्तविक स्वरूप निर्गुण, निराकार ,
नित्य, अजर, अमर, 'सत्-चित आनंद है ' और यह आत्मज्ञान मेरे स्थूल शरीरान्त तक बना
रहे  तो  नवीन शरीर ग्रहण करते समय भी  मैं पिछला सब याद रख सकता हूँ व  आनंद में
रमण करते हुए अपना विकास निरंतर  ही करते रह सकता हूँ .निरंतर विकास का अर्थ यहाँ
निष्काम कर्मयोग के द्वारा प्रारब्ध या 'कारण शरीर' के क्षय करने से है .'कारण  शरीर' की वजह
से ही स्थूल शरीर के बंधन में बंधना पड़ता है. 'कारण शरीर' के पूर्णतया क्षय होने पर  स्थूल
शरीर की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती है,जिसे जीव की मुक्ति माना जाता है.


परन्तु, आत्मज्ञान न होने की स्थिति में  हम खुद  को अज्ञानवश स्थूल शरीर ही  मान
लेते हैं इसीलिए हमारे  मस्तिष्क में जाने अनजाने यही 'command'  जाता रहता  है कि
स्थूल  शरीर के मरण के साथ ही हमारा भी मरण हो जायेगा. जिस कारण हम स्थूल  शरीर
की मृत्यु के समय मृत्यु भय से ग्रस्त हो अपनी तमाम याददाश्त को ही विस्मृत कर डालतें हैं
और जब नवीन शरीर ग्रहण करते हैं तो पिछला कुछ भी याद नहीं रहता. जबकि ऐसा बचपन
या जवानी की समाप्ति पर नहीं होता.  क्यूंकि बचपन और जवानी की मृत्यु हम सहज मानते हैं
और मस्तिष्क को यह 'command'  कभी नहीं देते कि हम मर गए हैं, इससे ह्मारी याददाश्त
बनी रहती है. ऐसे ही  सोते वक़्त भी  हम यह  कदापि महसूस नहीं करते कि सोने से हम मर
जायेंगें. इसलिये सोकर उठने पर याददाश्त बनी रहती है.  स्थूल शरीर की मृत्यु  के समय
केवल अज्ञान के कारण ही हम खुद के मरने का  गलत 'command'  दे बैठते हैं. फलस्वरूप
 'याददाश्त' का लोप हो  जाता है और सम्पूर्ण ज्ञान विस्मृत हो जाता है.

आत्मज्ञान के द्वारा  हम स्वयं के 'आनंद' स्वरुप का बोध कर पाते हैं .आनंद का  अक्षय
स्रोत अंत:करण में ही  निहित  है. आत्म बोध से  'कारण शरीर' का स्वाभाविक रूप से  क्षय होता है.
आत्मज्ञान रुपी विचार प्रवाह से  आनंद की तरंगें हृदय में उठने लगतीं हैं. जब यह प्रवाह
हृदय में अनवरत व नित्य  प्रकट होने  लगता है तो  दिव्य सरिता  का रूप धारण कर हृदय
की कलुषता  का निवारण करता रहता  है और हृदय को पवित्र पावन बना देता  है,जिससे हृदय
में उपरोक्त वर्णित अवधपुरी का भी  वास होने लगता है. यह आत्मज्ञान रुपी विचार प्रवाह की
दिव्य सरिता ही 'सरयू' नदी  है.

आत्मा  का   ज्ञान   वास्तव  में  एक आश्चर्य ही है. भगवद्गीता (अध्याय २ श्लोक २९) में
इसका निरूपण निम्न प्रकार से किया गया है.

                "कोई एक महापुरुष ही इस आत्मा  को आश्चर्य की भांति देखता है 
                  और  वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही इसके तत्व का आश्चर्य  की भांति 
                  वर्णन करता है  तथा दूसरा कोई अधिकारी पुरुष ही इसे आश्चर्य की भांति 
                  सुनता है  और कोई  कोई तो सुनकर भी इसे नहीं जानता "

आश्चर्य इसलिये है कि आत्मा के  विलक्षण आनंद के अनुभव की किसी भी  अन्य आनंद से
तुलना ही नहीं की जा सकती. .आत्मज्ञान रूपी    'सरयू' के जल को  इसी वजह से अति गहन
और गंभीर बताया गया  है.

कहते हैं सरयू के जल में राम जी यानि 'सत्-चित आनंद ' ने 'जल समाधि' ली हुई है.
जिस कारण इसके जल का सेवन करने से 'चिर स्थाई आनंद' का अनोखा स्वाद भी
मिलता है और जीव सहज  शांति  को प्राप्त हो जाता  है. फिर चलिए, अब सोचना क्या है,
पवित्र पावन सरयू नदी  के घाट पर  नित्य स्नान, ध्यान और आचमन कर असीम आनंद
में गोते लगा लिए जाएँ. 

आत्मज्ञान के और अधिक अनुसंधान हेतू श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय-२ (सांख्य योग) का अध्ययन
किया जा सकता है.''साख्य योग" में आत्मज्ञान का समन्वय इस प्रकार से किया गया है जिससे
हम जीवन में निष्काम कर्मयोग प्रतिपादित करने में भी सक्षम हो सकें. इसीलिए भगवद्गीता में
सांख्य योग के पश्चात ही कर्मयोग का निरूपण अध्याय-३ में किया गया है.



राम जी ,दशरथ जी व कौसल्या जी का तत्व चिंतन मेरी पोस्ट 'रामजन्म- आध्यात्मिक चिंतन-१'
में किया गया है.
चारो युगों अर्थात सत् युग ,त्रेता ,द्वापर व कलियुग का तत्व चिंतन मेरी पोस्ट
'रामजन्म -आधात्मिक चिंतन -२'  में किया गया है. तथा
अवधपुरी/अयोध्यापुरी,उपवास का तत्व चिंतन मेरी पोस्ट 'रामजन्म -आध्यात्मिक चिंतन-३' में
किया गया है.
सुधिजन उपरोक्त पोस्टों  का भी अवलोकन कर अपने सुविचारों  की आनंद वृष्टि कर सकते हैं.

मेरा यह सादर अनुरोध है कि उपरोक्त पिछली  पोस्टों का बार बार अवलोकन किया जाये,
जिससे राम, दशरथ, कौसल्या, त्रेता युग, अवधपुरी की स्थापना 'सरयू' जी की कृपा से हमारे हृदय
में ही हो, और 'राम मंदिर'  के लिए हमें दर दर न भटकना पड़े. यदि हृदय में 'राम मंदिर'
का सही प्रकार से  निर्माण हो जाये तो भौतिक जगत में राम मंदिर कहीं भी हो, इसका कोई
फर्क पड़नेवाला नहीं है.कहतें है आस्था और विश्वास से जैसा अंतर्जगत में हो वैसा ब्राह्य
जगत में भी घटित हो जाता है.

सुधिजन इस विषय कि 'रामजन्म और राम मंदिर का क्या स्वरुप हो' पर विस्तार से
अपने अपने विचार प्रकट करें तभी  इन  पोस्टों की सार्थकता का भी अनुभव हो पायेगा.

ओम् सच्चिदानन्देश्वराय नमो नम:

                 







    

Thursday, May 5, 2011

रामजन्म - आध्यात्मिक चिंतन - ३

आनंद का चिंतन करना अदभुत है,  मंगलकारी है . आनंद का एक एक पद, एक एक शब्द,
एक एक अक्षर मधुरातिमधुर  है. आप सुधिजनों ने मेरी पोस्ट 'रामजन्म - आध्यात्मिक चिंतन- १' 
'रामजन्मआध्यात्मिक चिंतन- २'  पर जो टिप्पणियाँ कीं उनमें आनंद ही आनंद समाया है  ,
जिससे मन आनंद निमग्न हों गया है. और विशाल भाई के इन उद्गारों ने  " सत आनंद ,
चित आनंद, असीम आनंद,बोध स्वरूपानंद ,ज्ञान स्वरूपानंद,अनिर्वचनीय  आनंद,अचिन्त्य आनंद,
अपरिमेय आनंद,आनंदमय आनंद, बस आनंद ही आनंद." ने तो मानो आनंद की बरसात ही
कर दी है.

आईये चलिये आनंद की इसी तरंग में ही अब  आगे बढते हैं. राम,  दशरथ, कौशल्या, युगों का
तात्विक चिंतन कर लेने के पश्चात अब 'अवधपुरी' या 'अयोध्यापुरी' का तत्व चिंतन करने का
प्रयास करते हैं. गोस्वामी तुलसीदास जी रामचरितमानस में लिखते हैं:-

                              नौमि   भौम   वार   मधुमासा,  अवधपुरी    यह    चरित    प्रकासा 
                              बंदउ  अवधपुरी अति पावनि, सरजू सरि कलि कलुष नसावनि

अवधपुरी का शाब्दिक अर्थ है ऐसी पुरी जहाँ कोई वध न हो. इसी प्रकार इसका पर्यायवाची
अयोध्यापुरी का भी अर्थ हैं ऐसी पुरी  जहाँ कोई युद्ध न हो. श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय ५, श्लोक १३)
 के अनुसार 'नवद्वारे पुरे देही'  कहकर इस नौ छिद्रों वाले  शरीर को ही नवद्वार रुपी पुरी
बतलाया गया है जिसमें  जीव यानि 'देही' का निवास है.

अपने अपने दृष्टिकोण,भावों और विचारों से हम अपने ही अंदर 'अवधपुरी' या 'लंका पुरी' की
स्थापना कर लेतें हैं. यदि हम स्वयं को शरीर मानकर अपने ही  अहंकाररुपी रावण के साम्राज्य
में आसुरी सम्पदा ईर्ष्या, द्वेष,चिंता, दुराशा,दंभ आदि को लेकर जीते हैं तो लंकापुरी की स्थापना
हो जाती हैं.परन्तु, अवधपुरी की स्थापना के लिए अपने को शरीर मानना छोड़ हमें सद्विवेक का
अनुसरण कर  'आत्मज्ञान'  की आवश्यकता है.

हमारे शास्त्रों में शरीर को  आत्मा का एक  आवरण मात्र बताया गया है. मै जब अपने
को शरीर मानता हूँ तो उसका 'वध' अथवा मरण  अवश्यम्भावी  है.जिस कारण मृत्यु भय
मुझे सताने लगता है.मृत्यु भय के रहते हृदय में 'रामजन्म' यानि चिर स्थाई आनंद का उदय
होना सम्भव ही नहीं है मृत्यु भय के कारण ही मै जीवन में तरह तरह की कुचेष्टायें  करता हूँ.
समस्त भ्रष्ट आचरण की जननी ऐसी कुचेष्टाएं ही हैं .परन्तु , जब मै स्वयं को
'सत्-चित-आनंद' परमात्मा का अंश 'आत्मा'  मानता हूँ तो आत्मा के  अवध होने के कारण मुझे
यह समझ आ जाता है कि मेरी   मृत्यु किसी भी प्रकार से भी सम्भव नहीं है. मै मृत्यु के
भय से निजात पा अपने ही स्वरुप 'आनंद' का  निर्बाध रूप से चिंतन व अनुभव करने में
समर्थ  हो जाता हूँ.  श्रीमद्भगवद्गीता में आत्मा के बारे में कहा गया है :-

                                  नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः
                                  न  चैनं  क्लेदयन्त्यापो  न शोषयति मारुत:
अर्थात इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, आग जला नहीं सकती,जल गला नहीं सकता,
और वायु सुखा नहीं सकती.

आत्मा का स्वरुप अजर है, अमर है,नित्य है, 'सत्-चित-आनंद' है, अवध है, अर्थात आत्मा का
'वध' कभी भी सम्भव नहीं है  जब इन भावों और विचारों का विवेकपूर्ण पोषण कर मै अपने
हृदय में गहन चिंतन द्वारा अच्छी प्रकार से स्थापित कर लेता हूँ तभी मेरे हृदय में 'अवधपुरी'   
स्थापित होने  लगती है.  मृत्यु का डर मेरे  हृदय से निकल जाता है ,  हृदय  शांत हो जाता है. 
मेरे विचारों और भावों में भी कोई किसी प्रकार का  संघर्ष या युद्ध नहीं रह जाता ,  इसीलिए 
अवधपुरी को  'अयोध्यापुरी' भी कहा गया है. ऐसी अयोध्या या अवधपुरी में ही राम यानि
'सत्-चित-आनंद' का जन्म नवमी तिथि, दिन मंगलवार (भौम) और मधुमास यानि बसंत ऋतु
में होता  है.

नवमी तिथि,मंगलवार और मधुमास  हृदय की उन स्थिति का सूचक हैं जब आत्मज्ञान की
साधना ,अभ्यास और उपवास परिपक्वता को प्राप्त हो,और हृदय में मंगल व उल्लास का सर्वत्र
संचार हो जाये.  'उपवास' का अर्थ   केवल कुछ खाना पीना छोडना मात्र नहीं ,बल्कि
मन बुद्धि के साथ राम के निकट जप, ध्यान और उपासना के द्वारा  वास करना है .
'सत्-चित-आनंद' का भाव तब  विभिन्न रंगों से मन को सदा सराबोर  किये रखता है और
मन  सहज ही गा उठता है :-

                        होली खेले रघुबीरा,   अवध में होली खेले रघुबीरा

ऐसी पावन अवधपुरी को हमारा शत शत नमन है, जिसमें आत्मज्ञान रूपी 'सरजू' नदी सदा
प्रवाहित होती रहती  है, जो 'कलियुग' की कलुषता  का हृदय से नाश करती है और जिसमें 
राम का जन्म होकर   राम चरित्र का प्रकाश हो पाता  है. अफ़सोस!  ऐसे विकार रहित प्रभु
के हृदय में रहते भी जगत के सब जीव दीन और दुःखी है, नाम का निरूपण करके नाम
का यत्न पूर्वक जप रुपी  साधन करने से वही राम ऐसे प्रकट हो जाता है जैसे रत्न के
जानने से उसका मूल्य. इसीलिए गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं :-
        
               अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी , सकल जीव जग दीन दुखारी
               नाम निरूपन  नाम  जतन ते , सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें

राम,  दशरथ व कौशल्या  के बारे में मेरी पोस्ट 'रामजन्म-आध्यात्मिक चिंतन-१' तथा चारो
युगों (सतयुग,द्वापर ,त्रेता एवम कलियुग) के बारे में मेरी  पिछली  पोस्ट
'रामजन्म-आध्यात्मिक चिंतन-२' में  प्रकाश डाला गया है.जो सुधिजन चाहें वे  इन पोस्टों 
का अवलोकन कर अपने सुविचार प्रकट कर आनंद की वृष्टि कर  सकते हैं.

                     

Thursday, April 21, 2011

रामजन्म - आध्यात्मिक चिंतन -२

राम यानि 'सत्-चित-आनंद' का भाव  व्यक्ति के  ह्रदय में जैसे जैसे घर करने लगता है,
उस व्यक्ति के विचारों, उसके भावों और कर्मों में भी यह भाव परिलक्षित होने  लगता है.
वह बोलेगा तो आनंद होगा, वह लिखेगा तो आनंद होगा , वह मूर्ति या चित्र बनायेगा तो
उसकी बनाई मूर्ति या चित्र में भी आनंद द्रष्टिगोचर होगा . आनंद का चिंतन किसी भी
प्रकार से  निरर्थक नहीं हो सकता  है, अत: आनंद को  धारण करना अति आवश्यक है.

हृदय में आनंद का भाव जैसे जैसे किशोर अवस्था को प्राप्त करेगा तो वह  व्यक्ति की
दुराशा का भी नाश करेगा. यह दुराशा (wrong expectation) ही 'ताडका' रुपी राक्षसनी है, जो
जीवन में उलझन व भटकाव पैदा करती रहती  है. अपनी दुराशाओं की वजह से ही व्यक्ति
अपने अच्छे खासे जीवन को भी  नरक बना लेता है,

आनंद का भाव फिर आगे जाकर व्यक्ति की कठोरता, निष्ठुरता का भी अंत कर डालता है.
ये कठोरता और निष्ठुरता ही मानो  'खर-दूषण'  हैं ,जो  मन रुपी वन में छिपे दुर्दांत राक्षस हैं.
फिर अंत में यही आनंद  का भाव  उस व्यक्ति के अहंकार यानि 'दशानन' अथवा रावण को भी
मार गिरा कर रामराज्य या पूर्णानंद की स्थापना कर देता है.  अहंकार को 'दशानन'  इसलिये
कहा  कि इसके भी दशों सिर होतें हैं.  धन का, बल का , विद्या का , रूप का, यौवन का 
आदि आदि.  अहंकार के मरे बैगर 'पूर्णानंद' की स्थिति को प्राप्त नहीं किया जा सकता.

यदि हम किसी भी महापुरुष की जीवनी का सूक्ष्म अध्ययन करें तो पायेंगें कि उन
महापुरुष ने जीवन में 'सत्-चित-आनंद'  भाव को ही धारण किया और अपनाया  था ,जिस
वजह से वे महापुरुष बन सके  और जन जन  से  उनको सम्मान मिला. यह  जरूरी  नहीं कि
'सत्-चित -आनंद'  भाव को केवल रामरूप में ही धारण किया जाये. अपनी अपनी रुचि और
आस्था अनुसार वह कृष्ण, अल्लाह या ईसा आदि भी हो सकता है.

चूँकि  इस लेख में हम रामजन्म का आध्यात्मिक चिंतन  करने की कोशिश कर  रहें हैं,
तो फिर रामजन्म पर ही पुनः विचार करतें हैं.  राम के पिता 'दशरथ'जी को व राम की
माता 'कौशल्या' जी को हमने पिछले लेख 'रामजन्म -आध्यात्मिक चिंतन -१'  में समझने
का एक प्रयास किया था.  मन को यदि 'दशरथ' और बुद्धि को 'कौशल्या' बना लिया जाये
तो  राम का जन्म हमारे हृदय में ही संभव है.

कहतें हैं राम का जन्म त्रेता युग में हुआ था. अब हम  त्रेता युग में कैसे पहुंचें आईये इस
पर भी विचार करते हैं. गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस के 'उत्तरकांड' के दोहा
संख्या १०३ (ख} से आगे निम्न प्रकार से चारो युगों का निरूपण किया हैं:-

                      नित जुग धर्म   होहिं सब केरे ,   हृदयँ राम माया के प्रेरे 
                      सुद्ध सत्व  समता बिग्याना , कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना 

श्रीराम जी की माया से प्रेरित होकर सबके हृदयों  में सभी युगों के धर्म नित्य होते रहते हैं.
शुद्ध सत्व गुण , समता ,विज्ञान और मन का प्रसन्न होना ही 'सतयुग'  का प्रभाव होता है.
यानि यदि हममें सम्यक ज्ञान है, विवेक है,  समता है विज्ञान है और मन भी हमारा प्रसन्न
है तो कहा जा सकता है कि हम 'सतयुग' में  जी रहें हैं. गोस्वामी जी आगे लिखते हैं:-

                      सत्व बहुत रज कछु रति कर्मा , सब विधि सुख त्रेता का धर्मा
                      बहु रज स्वल्प सत्व कछु तामस, द्वापर धर्म हरष भय मानस

सत्वगुण अधिक हो ,कुछ रजो गुण हो ,अर्थात क्रियाशीलता हो, कर्मों में प्रीति हो, सब प्रकार
से सुख हो तो यह त्रेता का धर्म है. यानि सतोगुण के रूप में  ज्ञान और विवेक के साथ साथ
कुछ क्रियाशीलता स्वरुप  कर्मों में प्रीति होने से हृदय में रजो गुण का भी संचार हो तो कह
सकते हैं कि उस समय हम 'त्रेता युग' में जी रहें हैं
.
परन्तु जब रजोगुण अधिक बढ़ जाये, सत्व गुण के रूप में ज्ञान और विवेक थोडा ही रह जाये
और कुछ तमोगुण के रूप में ह्रदय में आलस्य ,प्रमाद, अज्ञान और हिंसा का भी संचार होकर
मन में  कभी हर्ष  हो ,कभी भय हो तब  कह सकते हैं हम 'द्वापर युग' में जी रहे हैं.
'कलियुग' का निरूपण करते हुए गोस्वामीजी आगे  लिखते हैं:-

                      तामस बहुत रजोगुण थोरा ,   कलि प्रभाव विरोध चहुँ ओरा

तमोगुण अर्थात आलस्य, अज्ञान, प्रमाद,  हिंसा आदि हृदय में  बहुत बढ़ जाये ,रजोगुण
अर्थात क्रियाशीलता कम हो जाये, और ज्ञान व विवेक का तो मानो लोप ही हो जाये,
हृदय में चहुँ ओर विरोधी वृत्तियों का ही वास हो, सब तरफ अप्रसन्नता और विरोध हो,
तो कह सकते हैं हम उस समय 'घोर 'कलियुग' में ही जी रहे है.

यदि हम 'कलियुग' में जी रहें हो तो क्या यह संभव है कि हम अपनी मन:स्थिति को "त्रेता
युग' की बना लें. गोस्वामीजी इसका उत्तर इस प्रकार से देते हैं:-

                     बुध जुग धर्म जानी मन माहीं , तजि अधर्म रति धर्म कराहीं 

बुद्धिमान लोग अपने मन का अवलोकन कर यह जान लेते हैं कि उनका मन कब  किस
स्थिति में हैं .यानि मन 'कलियुग' में है या द्वापर में . वे मन कि स्थिति में सुधार लाने
के लिए तब अधर्म को तज  कर धर्म करने में रूचि लेने लगते हैं. धर्म करने का तात्पर्य यहाँ
उन बातों के पालन करने से है जिससे मन में सतोगुण का उदय होकर ज्ञान और विवेक का
संचार हो और तमोगुण व रजोगुण घटकर  'सत्-चित-आनंद ' भाव को ह्रदय में स्थाई रूप से
धारण किया जा सके. 

विभिन्न साधनों जैसे नामजप आदि  में सत्संग भी इसके लिए अति उत्तम साधन है.
सत्संग के सम्बन्ध में  कुछ विचार मेरी पोस्ट 'बिनु सत्संग बिबेक न होई'  में भी  किया
गया है. मेरा  सुधिजनों से निवेदन है कि सत्संग पर चिंतन के  लिए वे मेरी कथित पोस्ट
का अवलोकन कर सकते हैं.

यहाँ पर यह बताना भी मै उचित समझता हूँ कि तीनो गुणों अर्थात सतोगुण, रजोगुण व
तमोगुण के बारें में विस्तृत विवेचना भगवद्गीता के १४ वें अध्याय 'गुणत्रयविभागयोग'
में की गई जिसका सुधिजन अध्ययन कर लाभ उठा सकतें हैं.

इस प्रकार से हम श्री रामचरित्र मानस में और श्रीमद्भगवद्गीता में वर्णित ज्ञान के आधार
पर  स्वयं अपने हृदय में ही 'त्रेतायुग' का उदय कर रामजन्म का मार्ग प्रशस्त कर सकतें हैं.

इससे अगली पोस्ट में हम 'अवधपुरी' / 'अयोध्यापुरी'  व 'उपवास' आदि पर विचार करने
का प्रयास करेंगे.

मेरी चारों 'युगों' पर  जी टीवी के मंथन कार्यकर्म में की गई  चर्चा का
कुछ अंश ' http://www.zeenews.com/video/showvideo11180.html '  पर उपलब्ध है.
मेरा  शुरू का परिचय  ' http://www.zeenews.com/video/showvideo11181.html '  पर
कराया गया है.