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Tuesday, April 24, 2012

हनुमान लीला भाग-4

                           महाबीर बिनवउँ हनुमाना, राम जासु जस आप बखाना  

हनुमान जी का चरित्र अति सुन्दर,निर्विवाद और शिक्षाप्रद है, उन्ही के चरित्र की प्रधानता श्रीरामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड में सर्वत्र हुई है. सुन्दरकाण्ड का पाठ अधिकतर मानस प्रेमी घर घर में करते-कराते हैं.परन्तु ,सुन्दरकाण्ड के मर्म का चिंतन न कर केवल उसका पाठ  यांत्रिक रूप से कर लेने से हमें  वास्तविक  उपलब्धि नहीं हो पाती है जो कि होनी चाहिये.

रामायण  केवल कथा ही नहीं है.इसमें कर्म रुपी यमुना,भक्ति रुपी गंगा और तत्व दर्शन रुपी सरस्वती का अदभुत और अनुपम संगम विराजमान  है. आईये इस् पोस्ट में भी हम हनुमान लीला का  रसपान करने हेतु  श्रीरामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड का तात्विक अन्वेषण करने का कुछ प्रयत्न करते हैं.

 भगवान की शरणागति को प्राप्त हो जाना  जीवन की सर्वोत्तम और  सुन्दर उपलब्धि है.  हनुमान की शरणागति  सर्वत्र सुंदरता का  दर्शन करानेवाली है,जो कि सुन्दरकाण्ड का मुख्य आधार है. इस् काण्ड का नामकरण  इसीलिए हनुमानकाण्ड  न किया जाकर सुन्दरकाण्ड किया गया  है.
सुन्दरकाण्ड में तीन प्रकार की शरणागति का विषद वर्णन  हुआ  है

(१) हनुमान की शरणागति 
(२) विभीषण की शरणागति 
(३) समुन्द्र की शरणागति.

सुन्दरकाण्ड का मर्म समझने हेतु शरणागति को समझना अति आवश्यक है.यदि ध्यान से देखा जाए तो शरणागति ही हमारे शास्त्रों का वास्तविक लक्ष्य है. श्रीमद्भगवद्गीता में  अपना उपदेश पूरा करने के पश्चात भगवान श्री कृष्ण  अर्जुन को निम्न उपदेश देते हैं .
                   
                   सर्वधर्मान्परित्यज्य  मामेकं  शरणम  व्रज 
                   अहं त्वा  सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:

सम्पूर्ण धर्मों का आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरण में आ जा.मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूंगा.

यह  श्लोक  शरणागति का  गहन रहस्य प्रकट करता है.सम्पूर्ण धर्मों के त्याग का अर्थ यहाँ सम्पूर्ण धर्मों के आश्रय के त्याग से है.अपने सभी धर्मों को निष्ठापूर्वकनिभाएं यथा अपने शरीर पालन  करने का धर्म,माता पिता के प्रति संतान होने का धर्म,संतान के प्रति माता-पिता होने का धर्म,भ्राता धर्म,मित्र धर्म, देश और  लोक के प्रति देश धर्म,लोक धर्म,  आदि आदि,परन्तु, सभी धर्मों का आश्रय केवल परमात्मा यानि सत्-चित-आनन्द को पाना   हो तो ही  जीवन में भटकाव दूर हो जीव का उद्धार हो सकता है. परमात्मा की शरण में आने से जीव  निर्भय और पापरहित  होकर  सत्-चित -आनन्द में रमण करने का अधिकारी हो जाता है. परन्तु,यदि आश्रय सत्-चित-आनन्द का न होकर अन्यत्र हो तो जीवन में ठहराव नहीं  आने पाता  है, भटकन बनी रहती है और अंततः ठोकरे ही लगती हैं  .

अध्यात्म में समुन्द्र देह अभिमान का प्रतीक है.यानि हम अजर,अमर ,नित्य आनंदस्वरूप आत्मा होते हुए भी 
स्वयं को देह माने रहते है. विनयपत्रिका में  गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है  'कुणप -अभिमान  सागर 
भयंकर घोर', यानि देह का अभिमान घोर  और भयंकर सागर है.हम सब में जो  थोड़ी थोड़ी साधना करने वाले हैं वे सब जानते हैं कि भरसक प्रयत्न करने के बाबजूद भी हम देहाभिमान के किनारे ही खड़े रह जाते हैं.
जैसे कि सीता जी की  खोज करते हुए सभी वानर समुन्द्र के किनारे खड़े हुए समुन्द्र को लाँघने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं.परन्तु,हनुमानजी  जो  केवल  रामजी के ही  शरणागत हैं,जपयज्ञ और प्राणायाम स्वरुप हैं,इस देहाभिमान रुपी समुन्द्र को राम काज करने हेतु  लाँघने में समर्थ होते हैं.सीता की खोज  यानि परमात्मा को प्राप्त करने की परम चाहत की खोज ,.जो अहंकार रुपी रावण की नगरी में कैद हुई है, ही 'राम काज' है.शरणागति और रामकाज की बात  सुन्दरकाण्ड में हनुमान जी के मुख से  'बार बार रघुबीर संभारी','राम काज किन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम' आदि  वचनों द्वारा सुन्दर प्रकार से वर्णित हुई  है.

जब हनुमान जी लंका दहन कर राम जी के पास आये तो राम जी ने उनकी प्रशंसा करते हुए कहा 'प्रति उपकाकरौं का तोरा, सन्मुख होइ  न सकत मन मोरा' यानि हनुमान जी, मैं आपका कोई प्रति उपकार करने लायक  नहीं हूँ ,यहाँ तक कि मेरा मन भी तुम्हारी ओर नहीं देख पा रहा है,तुम्हारा सामना नहीं कर पा रहा है.
यह  निरभिमानी के लिए अति कठिन परीक्षा है.परन्तु,राम जी के इन वचनों को सुनकर भी निरभिमानी हनुमान प्रेमाकुल हो उनके चरणों में  पड़कर त्राहि त्राहि करने लगे.'चरण परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत', मैं आपकी शरण में हूँ,मुझे बहुत जन्म हो गए हैं गिरते पड़ते,ऐसी बातें कहकर मुझे  अपनी माया में न उलझाईये,मुझे बचा लीजिए,बचा लीजिए. अपने किये हुए काज का किंचितमात्र भी अभिमान नहीं है हनुमान जी में. हनुमान जी की शरणागति सम्पूर्ण और अनुपम  शरणागति है.

जब सीता जी ने 'अजर अमर गुननिधि सुत होहू, करहूँ बहुत रघुनायक छोहू' का आशीर्वाद हनुमान जी को दिया तो  भी वे राम जी के निर्भर प्रेम में मगन हो गए. '    'करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना,निर्भर प्रेम मगन हनुमाना'. इसके बाद ही शरीर धर्म के पालन हेतु उन्होंने सीता जी से आज्ञा माँगी 'सुनहु मातु मोहि अतिशय भूखा,लागि देख सुन्दर फल रूखा'.राम काज के लिए उन्होंने मान अपमान की भी कोई परवाह नहीं की.मेघनाथ के ब्रह्मास्त्र से जानबूझ कर बंधकर,राक्षसों की लात घूंसे खाते हुए घसीट कर ले जाते  हुए भी   रावण की सभा में वे गए,रावण को समझाने की कोशिश की ,वह नहीं माना तो लंका दहन किया.'कौतुक कहँ आये पुरबासी,मारहिं चरन करहिं बहु हांसी,बाजहिं ढोल देहीं सब तारी ,नगर फेरि पुनि पूंछ प्रजारी'.हनुमान जी की शरणागति श्रीमद्भगवद्गीता के उपरोक्त  श्लोक को पूर्णतया चरितार्थ करती है.सभी धर्मो का पालन करते हुए भी उनका आश्रय केवल राम जी के शरणागत रहना ही है.

विभीषण जी ऐसे विवेक का प्रतीक हैं जो 'अहंकारी' रावण का छोटा भाई बन उसकी लंका नगरी में रह रहा है. हैं.उनकी शरणागति हनुमान जी की शरणागति से निचले स्तर (lower level)की है.  जो  शुरू में राम जी की  भक्ति   लंका का राज्य प्राप्त करने हेतु  कर रहे थे और अधर्मी रावण की लंका नगरी भ्रात धर्म,देश धर्म आदि  के कारण  छोड़ नहीं पा रहे थे..जैसे कि कोई  व्यक्ति जीवन में भगवान की भक्ति से केवल भौतिक उपलब्धियों को प्राप्त कर  अधर्म पर आधारित सांसारिक धर्मों का ही निर्वाह  करना चाहता  है.परन्तु,हनुमान जी के दर्शन,सत्संग और मार्ग दर्शन से विभीषण की  शरणागति भी अंततः उच्च स्तर (high level) की हो गयी. जब उन्होंने भ्रात धर्म आदि  के मोह से मुक्त हो लंका का त्याग किया और राम जी का साक्षात्कार किया.उन्होंने राम जी के समक्ष स्वीकार  किया भी 'उर कछु प्रथम बासना रही,प्रभु पद प्रीति सरित सो बही'.विभीषण की शरणागति पहले  वासना सहित थी ,जो हनुमान जी की कृपा से वासना रहित हो गयी. यदि  हम  विभीषण जैसी स्थिति में हैं और ईश्वरभक्ति केवल भौतिक सुख सम्पदा पाने के लिए, अधर्म  का और रिश्ते नातों  का गलत प्रकार से पोषण   करने के लिए  कर रहें हैं, तो हनूमंत सत्संग की हमें भी  परम आवश्यकता है.

समुन्द्र वाली शरणागति मजबूरी की डंडे वाली शरणागति है.'बिनय न मानत जलधि  जड ,गए तीनि दिन बीति ,बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति'. जो परिस्थिति को नहीं समझता,पाप -पुण्य,भला बुरा नहीं समझता,धर्मों की मर्यादा के बहानों में बंधा रह कर ही  'राम काज' में निमित्त भी नहीं बनना चाहता,उसे जब ठोकरें लगें और डर कर वह प्रभु की शरण में आये तो ऐसी शरणागति निम्नतम स्तर (lowest level) की शरणागति है.यदि जीवन में ऐसी शरणागति भी  हो सके तो इसे  प्रभु की  कृपा ही समझनी चाहिए.

अंत में आप सभी सुधि जनों को मैं अपनी पोस्ट 'वंदे वाणी विनयाकौ' की पोड कास्ट जो कि अर्चना चाओ जी ने अपनी सुमुधुर वाणी में बनाई है को सुनवाना चाहूँगा.सुनने के लिए निम्न पर  क्लिक कीजियेगा

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इस पोस्ट को प्रकाशित करने में हुई देरी के लिए क्षमा चाहता हूँ.
आप सभी को अक्षय तृतीया, श्री परशुराम जयंती की हार्दिक शुभकामनाएँ.




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Thursday, February 16, 2012

मेरी बात - ब्लॉग्गिंग की प्रथम वर्षगाँठ

                             यज्ञ दान तप: कर्म  न त्याज्यं कार्यमेव तत्                           
                             यज्ञो दानं  तपश्चैव  पावनानि   मनीषिणाम्

यज्ञ,दान  और तपरूप कर्म त्याग करने के योग्य नहीं हैं,बल्कि वह तो अवश्य कर्तव्य हैं.क्यूंकि यज्ञ,दान और तप - ये तीनों ही कर्म बुद्धिमान पुरुषों को पवित्र करनेवाले हैं.

उपरोक्त श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय १८ का पांचवां श्लोक है.जिसमें  भगवान श्रीकृष्ण ने अपना निश्चय किया हुआ उत्तम मत  प्रकट किया है कि 'यज्ञ ,दान और तपरूप कर्मों को तथा और भी सम्पूर्ण कर्मों को आसक्ति और फलों का त्याग करते हुए अवश्य ही करना चाहिये'. इस श्लोक पर यदि चिंतन किया जाए तो हम पायेंगें कि यह हमारे सम्पूर्ण जीवन के लिए मूल मन्त्र   है.

'तप' का अर्थ उन बातों को  सीखते (Learn) रहना है  जो हमें जीवन में स्थाई (permanent)चेतन आनंद यानि ईश्वर  प्राप्ति की ओर अग्रसर करती रहें.तप करने में शरीर,मन ,बुद्धि,वाणी,कर्म सभी को सदा साधते रहना पड़ता  है.इसलिए जीवन के हर स्तर पर  सीखने के लिए तत्पर रहने की आवश्यकता है.अस्थाई (temporary) आनंद के लिए किया गया तप निरर्थक और क्लेश मात्र ही है.ब्लॉग्गिंग में सार्थक पोस्ट  और टिपण्णी लिखने  का प्रयास एक सुन्दर तप ही  है.

'यज्ञ' का अर्थ सीखे हुए को पूर्ण मनोयोग से  आनंदपूर्वक करते रहना ( execute smoothly)  है.यदि हम ऐसा नहीं करेंगें तो  हमने जो सीखा उसे  शीघ्र भुला देंगें.यज्ञ करते रहने से आनंद की वृष्टि होती है  जिससे सर्वत्र पोषण होता  है.इसलिए यज्ञ की भी हमेशा ही आवश्यकता है.श्रीमद्भगवद्गीता में अनेक प्रकार के यज्ञ बतलाये गए हैं .यथा 'द्रव्य यज्ञ, स्वाध्याय यज्ञ,जपयज्ञ ,ज्ञान यज्ञ आदि आदि.जिनमें 'ज्ञान यज्ञ' सर्वश्रेष्ठ यज्ञ और जप यज्ञ को भगवान ने अपना स्वरुप ही बतलाया  है.ब्लॉग जगत में 'ज्ञान यज्ञ' किया जाना  अभीष्ठ और श्रेष्ठ प्रयास  है.

'तप' और 'यज्ञ' करते रहने से ज्ञान और अनुभव अर्जित होता जाता है.यदि अर्जित  ज्ञान और अनुभव का वितरण (distribution)/दान न हो तो यह निरर्थक  रह सकता है .इसलिए  ज्ञान और अनुभव को सुयोग्य पात्र
को 'दान' करने की भी परम आवश्यकता है.यह सुयोग्य पात्र एक  'learner' या तपस्वी होता  है. अपने अपने ज्ञान और अनुभव का ब्लॉग जगत में अपनी पोस्टों और टिप्पणियों के माध्यम से वितरण किया जाए  तो
यह  जिज्ञासु जन/learners  के लिए सुन्दर दान है.

मैंने अपने ब्लॉग का नाम 'मनसा वाचा कर्मणा' इसी उद्देश्य से रक्खा है  कि  मन से,वाणी से और कर्म
से मैं आप सभी सुधिजनों के साथ सदा सीखने के लिए चेष्टारत रह सकूँ.माह फरवरी २०११ में मैंने अपनी
पहली पोस्ट 'ब्लॉग जगत में मेरा पदार्पण' लिखी थी.दूसरी पोस्ट 'जीवन की सफलता अपराध बोध से मुक्ति',तीसरी 'मन ही मुक्ति का द्वार है' ,चौथी 'मो को कहाँ ढूंढता रे बन्दे'.
फिर मार्च २०११ में 'मुद मंगलमय संत समाजू',' ऐसी वाणी बोलिए' और 'बिनु सत्संग बिबेक न होई' लिखीं.
अप्रैल में 'वंदे वाणी विनायकौ','रामजन्म -आध्यात्मिक चिंतन-१'
'रामजन्म-आध्यात्मिक चिंतन-२'.  
मई  २०११ में  'रामजन्म-आध्यात्मिक चिंतन-३' व 'रामजन्म- आध्यात्मिक चिंतन-४', 
जून,जुलाई, अगस्त,सितम्बर और अक्टूबर २०११ में 'सीता जन्म -आध्यात्मिक चिंतन-१' 
'सीता जन्म -आध्यात्मिक चिंतन-२','सीता जन्म-आध्यात्मिक चिंतन-३',
'सीता जन्म -आध्यात्मिक चिंतन-४'  'सीता जन्म आध्यात्मिक चिंतन-५' 
माह नवम्बर और दिसम्बर २०११ में 'हनुमान लीला -भाग १' और 'हनुमान लीला -भाग २' लिखीं.
और माह जनवरी २०१२ में ब्लॉग्गिंग में एक वर्ष पूर्ण करने से पूर्व  'हनुमान लीला भाग-३' लिखी.
इस प्रकार कुल २० पोस्ट ही मेरे द्वारा लिखीं गयीं जिन पर आप सुधिजनों ने अपने सुवचनों का
अनुपम 'दान' और भरपूर सहयोग मुझे दिया  है.यह मेरे लिए अत्यंत हर्ष और उत्साह की बात है
कि मैं आपका कृपा पात्र बन सका.इसके लिए मैं आप सभी का हृदय से आभारी हूँ और सदा ही रहूँगा.
मैं यह भी आग्रह करूँगा कि जिन सुधिजनों की उपरोक्त पोस्ट में से कोई पोस्ट पढ़ने से रह गयीं हों तो
वे एक बार  उस पोस्ट को पढकर अपने सुविचार प्रकट अवश्य करें.

मैं सदा प्रयासरत रहना चाहूँगा कि आप सभी के साथ सत्संग के माध्यम से एक दुसरे से सीखना जारी रहे
और 'तप', यज्ञ' और 'दान' के माध्यम से हम अपने अपने जीवन को सुखमय,आनन्दित व पावनमय बनाने
में भगवान कृष्ण के उपरोक्त उत्तम मत को अपने हृदय में धारण कर सकें. आप अपना अमूल्य समय
निकाल कर मेरे ब्लॉग पर आते हैं,और सुन्दर टिपण्णी से  मेरे प्रयास को यज्ञ का स्वरुप प्रदान करते हैं
इससे आनंद की वृष्टि होती है.मैं भी आपके ब्लोग्स पर जाकर टिपण्णी करने का यथा संभव प्रयास
करता हूँ.सभी सुधिजनों की सभी पोस्ट पर नहीं जा पाता हूँ,इसका मुझे खेद है. डेश बोर्ड पर भी आपकी
पोस्ट बहुत बार चूक जातीं हैं.सभी से  अनुरोध है कि आप अपनी पोस्ट की सुचना मेरे ब्लॉग पर अपनी
टिपण्णी के साथ भी दें तो आसानी रहेगी.मैं भी अपनी पोस्ट की सूचना आपके ब्लॉग पर अक्सर दे देता हूँ.
यदि सूचना के बाबजूद  नियमित पाठक नहीं आतें हैं तो मुझे चिंता और निराशा होती है.चिंता उनके
कुशल मंगल के विषय में जानने की व निराशा उनके अनमने या नाराज होने की.यदि मेरी  किसी भी बात से
आपको नाराजगी हुई हो तो इसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ.अपनी नाराजगी यदि आप मुझे बताएं  तो मैं
उसको यथा संभव दूर करने का प्रयत्न करूँगा.परन्तु,आपका अकारण नाराज होना और अनुपस्थित रहना
मुझे व्यथित करता है.मैं आप सभी को यह भी बतलाना चाहूँगा कि इंटरनेट और कंप्यूटर की मुझे
अति अल्प  जानकारी  है.इस सम्बन्ध में मुझे समय समय पर 'खुशदीप भाई' 'केवल राम जी','शिल्पा बहिन' और 'वंदना जी का सहयोग मिलता रहा है.इसके लिए मैं उनका हृदय से आभारी हूँ.

ब्लॉग जगत में हम सब का सकारात्मक मिलन परम सौभाग्य की बात है. पोस्ट,टिपण्णी व प्रति टिपण्णी
द्वारा ही सुन्दर 'वाद' की सृष्टि होती है ,जो 'परमात्मा' अर्थात 'सत्-चित -आनंद' की एक उत्तम विभूति ही है.

ब्लॉग्गिंग की प्रथम वर्ष गाँठ पर 'मेरी बात' पढ़ने के लिए आप सभी का पुनः बहुत बहुत हार्दिक आभार
और धन्यवाद.

आज ही मेरे बेटे पारस का  पच्चीसवां  जन्म दिवस भी है.
                              
                        जय जय जय हनुमान गुसाईं, कृपा करो गुरु देव की नाईं

अगली पोस्ट भी मैं 'हनुमान लीला' पर ही जारी रखना चाहूँगा.

आप सभी की कृपा और आशीर्वाद का सैदेव आकांक्षी
राकेश कुमार.



Friday, January 20, 2012

हनुमान लीला - भाग ३

                           नहिं कलि करम न भगति बिबेकू, राम   नाम    अवलंबन    एकू
                           कालनेमि   कलि   कपट  निधानू, नाम  सुमति समरथ हनुमानू

'कलियुग में न कर्म है, न भक्ति है और न ज्ञान ही है.केवल रामनाम  ही एक आधार है.कपट की खान
कलियुग रुपी कालनेमि को मारने के लिए 'रामनाम' ही बुद्धिमान और समर्थ श्रीहनुमानजी हैं.'

मेरी  पोस्ट   'रामजन्म -आध्यात्मिक चिंतन-२'   में  श्रीरामचरितमानस  में  वर्णित  कलियुग  का
निम्न  आध्यात्मिक निरूपण  किया गया था.

                      तामस बहुत रजोगुण थोरा ,   कलि प्रभाव विरोध चहुँ ओरा

हमारे हृदय में जब तमोगुण अर्थात आलस्य, अज्ञान, प्रमाद,  हिंसा आदि  बहुत बढ़ जाये ,रजोगुण अर्थात 
क्रियाशीलता कम हो जाये,और सतोगुण यानि ज्ञान व विवेक का तो मानो लोप ही हो जाये, चहुँ  ओर विरोधी 
वृत्तियों का ही हृदय में वास हो, सब तरफ अप्रसन्नता और विरोध हो, तो कह सकते हैं हम उस समय 
'घोर 'कलियुग' में ही जी रहे है.

कलियुग  मन की निम्नतम स्थिति या अधोगति की वह  अवस्था है जिस  में सकारात्मक सोचने और
निर्णय करने की शक्ति यानि विवेक का सर्वथा अभाव होने से कोई सद्कर्म नही हो पाता. न ही मन
ईश्वर से जुड़ने अर्थात भक्ति का आश्रय ले पाता है. मन में विरोधी वृत्तियों का वास 'कालनेमि' राक्षस
के समान सदा ही धोखा देने और ठगने में लगा रहता है. 'कालनेमि'  हमारे अहंकार रुपी रावण का ही
एक सहयोगी है. जो ठग विद्या में अति निपुण है.यह  'राम नाम' का झूंठा प्रदर्शन और ढोंग  करके
हनुमान जी को भी ठगना चाहता है.परन्तु, हनुमान जी सदा सजग है,बुद्धिमान है.इसीलिए वे कालनेमि
राक्षस के कपट को समझ लेते हैं और अंतत:उसका वध कर डालते है.  सही प्रकार से नित्य सजग  'नाम
स्मरण' वीर हनुमान की तरह ही हमारी कपट और ढोंग से रक्षा करता रहता है.

मेरी पिछली पोस्ट 'हनुमान लीला - भाग २' में हमने जाना कि 'हनुमान' शब्द ने किस प्रकार से अपने अंदर
'ऊँ' कार रुपी परमात्मा के नाम  को धारण कर रक्खा है. यदि हम हृदय  में 'आकार' को धारण करते हैं,तो
अहंकार की उत्पत्ति होती है.  आकार शरीर,मन ,बुद्धि आदि किसी भी  स्तर  पर दिया जा सकता है.यदि
शरीर के आधार पर मैं स्वयं को मोटा,पतला,गोरा,शक्तिशाली,सुन्दर आदि  होने का मान दूँ तो तदनुसार ही
मेरे  अहंकार का उदभव होता है व  मैं  खुद को वैसा ही समझने लगता हूँ .इसी प्रकार मन के आधार पर सुखी,
दुखी, बुद्धि के आधार पर बुद्धिमान, तार्किक आदि होने का अहंकार होता है. पर 'हनुमान' तो किसी भी
आकार को धारण न कर केवल 'ऊँ' कार को ही धारण करते हैं.जिसका अर्थ है वे हमेशा 'ऊं ' को ध्याते हैं,
'ऊं' का भजन करते हैं,'ऊं' का ही मनन करते हैं.हनुमान इतने निरभिमानी हैं कि वे परमात्मा के ध्यान
में स्वयं को भी भूल जाते हैं.इसीलिए जाम्बवान (रीछ पति) को उनका आह्वाहन करते हुए कहना पड़ता है
             
                      कहइ  रीछपति सुनु  हनुमाना,का चुप  साधी रहेउ  बलवाना 
                      पवन तनय बल पवन समाना,बुद्धि बिबेक बिग्यान निधाना
          

'ऊँ' को ध्याने से 'ऊं' का जप करने से प्राणायाम की  स्थिति होती है , प्राण की उर्ध्व गति होती है.सांसारिक
और विषयों के चिंतन से प्राण की अधोगति होती है.क्यूंकि तब 'साँस' विषमता को प्राप्त  होता रहता है.
परन्तु , जब 'ऊँ' का उच्चारण किया जाता है तो जितनी देर  या लम्बा हम 'ओ' बोलते हैं , शरीर से कार्बन
डाई ऑक्साइड (CO2) उतनी ही अधिक बाहर निकलती है. जैसे ही 'म' कहकर 'ओम्' का उच्चारण पूर्ण कर
लिया जाता है , इसके बाद लंबी   साँस के द्वारा ऑक्सीजन (O2) शरीर में  गहराई  से प्रवेश करती है.इस
पूरी प्रक्रिया में  जहाँ शरीर स्वस्थ होता है,मन और बुद्धि भी शांत होते जाते हैं. अधिकतर मन्त्रों  में  'ऊँ' का
सर्वप्रथम होने का यही कारण है कि 'ऊँ' परमात्मा का आदि नाम है तथा प्राण को हमेशा 'उर्ध्व' गति प्रदान
करता है.इसीलिए तो हनुमान 'ऊँ' को सैदेव हृदय में धारण किये हुए हैं.कहते हैं जब उनसे पूछा गया कि
'सीता राम' कहाँ हैं तो उन्होंने अपना सीना फाड़ कर सभी को 'सीता राम' के दर्शन करा दिए.'सीता' यानि
परमात्मा की परा भक्ति , राम यानि 'सत्-चित-आनन्द' परमात्मा सदा ही उनके हृदय में विराजमान हैं.

हनुमान की भगवान के प्रति अटूट  शरणागति सभी के लिए अनुकरणीय है.शरणागति का सरलतम
अर्थ है 'आश्रय'की अनुभूति.दुनिया का ऐसा कोई जीव  नही है जिसको आश्रय या सहारे की आवश्यकता
न हो.परन्तु आश्रय किसका ?यह बात अलग हो सकती है.भविष्य की अनिश्चितता के कारण प्राय:  सभी
के मन मे संदेह,भय,असुरक्षा घर किये रहते हैं.यदि सही आश्रय मिल जाता है तो व्यक्ति निश्चिन्त सा हो
जाता है.सांसारिक साधन कुछ हद तक ही सहारा देते हैं,अत: वे सापेक्ष (relative)  हैं.जब तक समुचित
सहारे का अनुभव नही होता,मन अशांत होता रहता है.ईश्वर का आश्रय होने से चित्त में आनन्द का
आविर्भाव होता है,चित्त में निश्चिन्तता आती है. हनुमान  हमेशा निश्चिन्त हैं ,क्यूंकि उनका आश्रय
'राम' हैं, जो निरपेक्ष(absolute) है,स्थाई  और चेतन आनन्द  है,शरणागत वत्सल है.

समस्त अनिश्चिंतता,भय संदेह ,असुरक्षा का कारण 'मोह' अर्थात अज्ञान है,अज्ञान के साथ अभिमान
अर्थात यह मानना कि मुझे किसी आश्रय की आवश्यकता नही है अत्यंत शूलप्रद और कष्टदायी होता है.
रावण को लंका दहन से पूर्व समझाते हुए इसलिये हनुमान जी कहते हैं.
                                       
                                        मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान 
                                        भजहु  राम  रघुनायक  कृपा  सिंधु भगवान 

शस्त्र और शास्त्र दोनों के धनी श्री गुरू गोविन्द सिंह जी भी सुस्पष्ट शब्दों में कहते हैं:-
                                           
                                                सबै  मंत्रहीनं   सबै    अंत कालं 
                                                भजो एक चित्तं  सुकालं कृपालं 
                            'जब अंत समय आता है तो सभी मंत्र निष्फल हो जाते हैं,
                             इसीलिए मन लगाकर  कृपा सिंधु प्रभु का भजन  करो.'

यदि हृदय में मोह और अभिमान छोड़ प्रभु को धारण कर हनुमान जी की तरह प्रभु का भजन किया
जाये तो कलि युग रुपी कपट की खान कालनेमि हमारा  कुछ भी बिगाड नही सकता है.

आप सभी सुधिजनों का मैं दिल से आभार व्यक्त करता हूँ कि आपने मेरी हनुमान लीला की पिछली
दोनों पोस्टों ('हनुमान लीला-भाग १' तथा 'हनुमान लीला - भाग २') को मेरी लोकप्रिय (popular) पोस्टों
में लाकर  प्रथम व द्वितीय स्थान पर पहुँचा दिया है.आशा है आप मेरी इस पोस्ट पर भी  अपने प्यार,
सहयोग और सुवचनों  के द्वारा   मेरा उत्साहवर्धन अवश्य करेंगें.यदि आप सभी की अनुमति और परामर्श
हो तो अगली कड़ी भी मैं हनुमान लीला पर ही आधारित रखना चाहूँगा.

आप सभी को नववर्ष की शुभकामनाएँ,मकर सक्रांति की शुभकामनाएँ और आनेवाले गणतंत्र दिवस की
बहुत बहुत शुभकामनाएँ.

 




Monday, December 19, 2011

हनुमान लीला - भाग २

                                मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं  बुद्धिमतां वरिष्ठम्
                                वातात्मजं  वानरयूथमुख्यं   श्रीरामदूतं   शरणं   प्रपध्ये
        मैं मन के समान  शीघ्र गति युक्त , वायु के समान प्रबल वेग वाले, इन्द्रियों को जीत लेने वाले,
        बुद्धिमानों  में  श्रेष्ठ , वायुपुत्र, वानर समूह के अग्रणी ,श्री रामदूत की  शरण को  प्राप्त होता हूँ.  


मेरी पिछली पोस्ट 'हनुमान लीला -भाग १' पर सुधिजनों ने अपने  अपने अमूल्य विचार प्रस्तुत किये हैं.
'हनुमान' शब्द  की  व्याख्या  के सम्बन्ध में भी  सुधिजनों की सुन्दर जिज्ञासा व विचार  जानने को   मिले. 


केवल राम जी कहते हैं :-
"हनुमान" शब्द अपने आप में एक अलग व्याख्या की अपेक्षा रखता है .उस पर प्रकाश डालने की आवश्यकता है ..   


Dr M.N. Gairola जी का कहना हैं:-
Ego,is the biggest obstacle in realization..that way hanuman can be iterpreted as annihilation of Ego...... 

वंदना जी लिखती हैं :-
कहते है जिसने अपने मान का हनन कर दिया हो वो है हनुमान्…जो मान अपमान से परे हो गया हो और 
जिस हाल मे प्रभु खुश रहे और रखें उसी मे अपनी खुशी चाही हो वो ही कहलाता है हनुमान्…हनुमान होना 
आसान कहाँ है ? 

Sunil Kumar  जी लिखते हैं :-
श्री हनुमान निश्छल ह्रदय और अनन्य भक्ति का एक अद्भुत संगम हैं.उन पर गहरा विश्वास अकल्पनीय 
बाधाओं से मुक्ति दिला सकता है.

veerubhai  जी कहते हैं :-
हनू -मान का मतलब ही उच्चतर मान है .मन की उद्दात्त अवस्था है 

हनुमान तत्व की स्थापना के लिए कपि मन को बार बार सत्संग की जरूरत पड़ती है 


हनुमान शब्द की व्याख्या यद्धपि आसान नही है. फिर भी इस  पोस्ट मे 'हनुमान' जी को समझने का  प्रयास
करते हुए आईये चंचल  कपि मन और बुद्धि को केंद्रित कर  डॉ. नूतन जी के अनुसार कुछ समय सत्संग का ही 
आश्रय लेते  हैं.

हनुमान शब्द  में 'ह' हरि  यानी विष्णु स्वरुप है,  जो पालन कर्ता के रूप में वायु द्वारा शरीर,मन  
और बुद्धि का पोषण करता है.कलेशों का हरण करता है.

हनुमान शब्द  में 'नु' अक्षर  में 'उ' कार है, जो शिव स्वरुप है. शिवतत्व कल्याणकारक है ,
अधम वासनाओं का संहार कर्ता है.शरीर ,मन और बुद्धि को निर्मलता प्रदान करता है.

हनुमान शब्द  में 'मान' प्रजापति ब्रह्मा स्वरुप ही  है. जो सुन्दर स्वास्थ्य,सद्  भाव और 
सद् विचारों का सर्जन कर्ता है.

निष्कर्ष हुआ कि  ह-अ,   न्- उ , म्-त  यानि हनुमान में  अ   उ   म्  अर्थात परम अक्षर 'ऊँ'  विराजमान है  जो 
एकतत्व  परब्रहम  परमात्मा का प्रतीक है. जन्म मृत्यु तथा सांसारिक वासनाओं की मूलभूत माया का विनाश 
ब्रह्मोपासना के बिना संभव ही नही है.हनुमान का आश्रय लेने से मन की गति स्थिर होती है ,जिससे शरीर में 
स्थित पाँचो प्राण  (प्राण , अपांन, उदान, व्यान ,समान) वशीभूत हो जाते हैं और साधक ब्रह्मानंद रुपी अजर 
प्याला पीने में सक्षम हो जाता है.  

पिछली  पोस्ट में भी हमने  जाना था कि हनुमान जी  वास्तव में 'जप यज्ञ'  व 'प्राणायाम' का  साक्षात ज्वलंत  स्वरुप ही हैं. आयुर्वेद मत के अनुसार शरीर में तीन तत्व  वात .पित्त  व कफ यदि सम अवस्था में रहें तो शरीर निरोग रहता है.इन तीनों मे वात  यानी वायु तत्व अति सूक्ष्म और प्रबल है.जीवधारियों का सम्पूर्ण पोषण -क्रम वायु द्वारा ही होता है. आयुर्वेदानुसार शरीर में दश वायु (१) प्राण (२) अपान (३) व्यान (४) उदान (५) समान (६) देवदत्त (७) कूर्म (८) कृकल (९) धनंजय  और (१०) नाग  का संचरण होना माना गया है.शरीर मे इन दशों वायुओं के कार्य भिन्न भिन्न हैं. हनुमान जी पवन पुत्र हैं . वायु से उनका घनिष्ठ सम्बन्ध है.शास्त्रों में उनको ग्यारहवें रूद्र का अवतार भी कहा गया है.एकादश रूद्र  वास्तव में  आत्मा सहित उपरोक्त दश वायु ही माने गए हैं.अत : हनुमान   आत्मा यानि प्रधान वायु के अधिष्ठाता  हैं.

वात  या  वायु  के अधिष्ठाता होने के कारण हनुमान जी की आराधना से सम्पूर्ण वात व्याधियों का नाश होता है.
प्रत्येक दोष वायु के माध्यम से ही उत्पन्न और विस्तार पाता है.यदि शरीर में वायु शुद्ध रूप में स्थित है तो शरीर निरोग रहता है. कर्मों,भावों और विचारों की अशुद्धि से भी  वायु दोष उत्पन्न होता है.वायु दोष को  पूर्व जन्म व इस जन्म में किये गए पापों के रूप में भी जाना जा सकता है.अत: असाध्य से असाध्य रोगी और जीवन से हताश व्यक्तियों के लिए  भी हनुमान जी की आराधना  फलदाई है. गोस्वामी तुलसीदास की भुजा में जब वायु  प्रकोप के कारण  असाध्य पीड़ा हो रही थी , उस समय उन्होंने 'हनुमान बाहुक' की रचना करके उसके  चमत्कारी प्रभाव का  प्रत्यक्ष अनुभव किया.

वास्तव में चाहे 'हनुमान चालीसा' हो या 'हनुमान बाहुक' या 'बजरंग बाण' ,इनमें से प्रत्येक रचना का मन लगाकर 
पाठ करने से अति उच्च प्रकार का प्राणायाम होता है.प्राण वायु को सकारात्मक बल की प्राप्ति होती है.पापों का शमन होता  है.इन रचनाओं के प्रत्येक शब्द में आध्यात्मिक गूढ़ अर्थ भी छिपे हैं.जिनका ज्ञान जैसे जैसे होने लगता है तो हम आत्म ज्ञान की प्राप्ति की ओर भी स्वत: उन्मुख होते जाते हैं. 

हनुमान जी सर्वथा मानरहित हैं, वे  अपमान या सम्मान  से परे हैं. 'मैं'  यानि  'ego'  या अहं के तीन स्वरुप हैं .शुद्ध स्वरुप में  मै 'अहं ब्रह्मास्मि'  सत् चित आनंद  स्वरुप ,निराकार परब्रह्म  राम  हैं.साधारण अवस्था में जीव को 'अहं ब्रह्मास्मि' को समझना  व अपने इस शुद्ध स्वरुप तक पहुंचना आसान नही.परन्तु, जीव जब दास्य भाव ग्रहण कर सब कुछ राम को सौंप केवल राम के  कार्य यानि आनंद का संचार और विस्तार करने के लिए पूर्ण रूप से भक्ति,जपयज्ञ , प्राणायाम  व कर्मयोग द्वारा नियोजित हो राम के अर्पित हो जाता है तो उसके अंत: करण में   'मैं' हनुमान भाव  ग्रहण करने लगता है. तब वह  भी मान सम्मान से परे होता जाता है और 'ऊँ  जय जगदीश हरे  स्वामी जय जगदीश हरे ...तन मन धन  सब है तेरा स्वामी सब कुछ है तेरा, तेरा तुझ को अर्पण क्या लागे मेरा ..'  के शुद्ध  और सच्चे  भाव उसके  हृदय में  उदय हो  मानो वह हनुमान ही होता  जाता है.

लेकिन जब सांसारिकता में लिप्त हो  'मैं' या अहं को   तरह तरह का  आकार दिया  जाता  हैं तो हमारे अंदर यही मैं  'अहंकार' रुपी रावण हो  विस्तार पाने लगता है. जिसके दसों सिर भी   हो जाते हैं.  धन का , रूप का , विद्या का , यश का  आदि आदि. यह रावण या अहंकार तरह तरह के दुर्गुण रुपी राक्षसों को साथ ले हमारे स्वयं के अंत;करण में ही लंका नगरी का अधिपति हो  सर्वत्र आतंक मचाने में लग जाता है.अत:  अहंकार रुपी रावण की इस लंका पुरी को ख़ाक करने के लिए और परम भक्ति स्वरुप सीता का पता लगाने के लिए 'मैं' को हनुमान का आश्रय ग्रहण करने  की परम आवश्यकता है.अहंकार की लंका नगरी को  शमन कर ज्ञान का प्रकाश करने का प्रतीक  यह हनुमान रुपी 'मैं ' ही हैं . 

कबीर दास जी की वाणी में कहें तो
                                  सर राखे सर जात है,सर काटे सर होत 
                                  जैसे बाती दीप की,जले  उजाला   होत 

अर्थात  सर या अहंकार के रखने से हमारा  मान सम्मान सब चला जाता, परन्तु अहंकार का शमन करते रहने  
से हमें स्वत; ही मान सम्मान मिलता  है. जैसे दीप की बाती  जलने पर उजाला करती है,वैसे ही अहंकार का शमन 
करने वाले व्यक्ति के भीतर और बाहर  ज्ञान का उजाला होने लगता है.

इस पोस्ट में हनुमान शब्द  की व्याख्या सुधिजनों की जिज्ञासा और रूचि को ध्यान में रखते हुए ही मैंने आप सभी के सत्संग के माध्यम से करने की  कोशिश की है. हनुमान लीला अत्यंत कल्याणकारी और अपरम्पार है.  अगली पोस्ट में हनुमान लीला का चिंतन आगे बढ़ाने का  प्रयास प्रभु की कृपा व  सुधिजनों  की दुआ और आशीर्वाद से  पुनःकरूँगा. आशा है आप सब  इस पोस्ट पर भी  अपने अपने अमूल्य विचार व अनुभव प्रकट करने में कोई कमी नही रखेंगें और  अपने सुविचारों से मेरा सैदेव मार्ग दर्शन करते रहेंगें.

Friday, November 25, 2011

हनुमान लीला - भाग १

                        अतुलितबलधामं     हेमशैलाभदेहं
                                           दनुजवनकृशानुं    ज्ञानिनामग्रगण्यम 
                         सकलगुणनिधानं  वानरणामधीशं
                                           रघुपतिप्रियभक्तं   वातजातं  नमामि  


अतुलित बल के धाम , सोने के पर्वत के समांन  कान्तियुक्त  शरीर वाले ,दैत्यरूपी  वन को आग 
लगा देने वाले (अधम वासनाओं का  भस्म करने वाले), ज्ञानियों में सर्वप्रथम,सम्पूर्ण गुणों के भण्डार 
वानरों के स्वामी ,श्री रघुनाथ जी के प्रिय भक्त  पवनपुत्र श्री हनुमान जी को मैं प्रणाम करता हूँ.


मेरी पोस्ट 'रामजन्म -आध्यात्मिक चिंतन-१' से 'रामजन्म - आध्यात्मिक चिंतन-४''सीता जन्म
-आध्यात्मिक चिंतन १' से 'सीता जन्म -आध्यात्मिक चिंतन -५' तक मैंने 'राम', 'दशरथ','कौसल्या'
'सतयुग, त्रेता ,द्वापर  व कलयुग''उपवास', 'अयोध्या', 'अवधपुरी', 'सरयू', 'सीता' , 'पार्वती', 'शिव',
'अर्थार्थी, जिज्ञासु ,आर्त व ज्ञानी भक्त' , 'जप यज्ञ' आदि  का  चिंतन आध्यात्मिक रूप से  करने की
कोशिश की  है. इस प्रकार के चिंतन से हमें यह लाभ है  कि हम पौराणिक  या ऐतिहासिक वाद  विवादों
से परे हटकर अपना ध्यान केवल  'सार तत्व' पर केंद्रित करने में समर्थ होने लगते हैं. ज्यूँ ज्यूँ  उचित
साधना का अवलंबन कर सार्थक चिंतन मनन से 'सार तत्व' हमारे अंत;करण में घटित होने लगता है
तो हम अखण्ड आनंद की स्थिति की और अग्रसर होते  जाते  हैं.


मेरी पिछली पोस्ट 'सीता जन्म -आध्यात्मिक चिंतन-५' में  'जप यज्ञ' पर कुछ प्रकाश डाला गया था.
इस पोस्ट में मैं हनुमान जी के स्वरुप का आध्यात्मिक चिंतन करने का प्रयास करूँगा. हनुमान जी  
वास्तव में 'जप यज्ञ'  व 'प्राणायाम' का साक्षात ज्वलंत  स्वरुप ही हैं.साधारण अवस्था में  हमारे  मन, 
बुद्धि,प्राण अर्थात हमारा अंत:करण  अति चंचल हैं जिसको कि  प्रतीक रूप मे हम वानर या कपि भी 
कह सकते हैं. लेकिन जब हम 'जप यज्ञ'  व  'प्राणायाम ' का सहारा लेते हैं तो  प्राण सबल होने लगता है. 
कल्पना कीजिये जब अंत:करण प्राणायाम व 'जप यज्ञ' से पूर्ण संपन्न हो जाये  तो उसका  स्वरुप   
क्या होगा .शास्त्रों में 'हनुमान जी' की कल्पना  मेरी समझ में इसी  प्रकार के अंत:करण से ही  की गई  है.
'जप यज्ञ' या 'प्राणायाम' बिना वायु के संभव नही है.इसीलिए हनुमान जी को 'पवन पुत्र', 'वात जातं'  
कहा गया है.  'जप यज्ञ' व 'प्राणायाम' से पूर्ण संपन्न  अंत: करण को  'वानराणामधीशं'  नाम से भी 
पुकारा गया  है.क्योंकि ऐसा अंत:करण ही समस्त अंत;करणों का स्वामी हो सकता है जो  प्रचंड शक्ति 
पुंज व  अग्निस्वरूप होने के कारण 'हेमशैलाभदेहं' के रूप में भी ध्याया जा सकता है.जिसमें समस्त 
विकारों,अधम वासनाओं को भस्म करने की  स्वाभाविक सामर्थ्य   है. ऐसा अंत:करण सकल गुण निधान,
ज्ञानियों में सर्व प्रथम,राम जी का प्रिय  भक्त भी होना ही चाहिये.इस प्रकार से अंत; करण की सर्वोच्च  
अवस्था का हनुमान जी के रूप में ध्यान कर,  हम 'जप यज्ञ' व 'प्राणायाम' का अवलंबन करें तो ही 
हनुमान जी की वास्तविक पूजा  व आराधना  होगी.


हम देखते हैं कि जगह जगह हनुमान जी के मंदिर बने हुए हैं. मंगलवार को हनुमानजी पर प्रसाद चढाने 
वालों की  लंबी भीड़ भी लगी होती है.हम  अधिकतर अंधानुकरण करते हुए  हनुमान जी की मूर्ति के 
मुख पर प्रसाद लगा, या हनुमान जी पर सिन्दूर आदि का लेप कर अपनी इतिश्री समझ लेते हैं. क्या 
इस प्रकार के कर्म काण्ड से  ही हमारा अंत:करण सबल हो पायेगा? यदि हनुमान जी की भक्ति का हमें 
वास्तविक लाभ लेना है तो निश्चित ही  हमें जप यज्ञ  व प्राणायाम से  अपने अंत:करण को सबल करना 
होगा. तभी  हनुमान जी प्रसन्न होकर हमें राम जी से मिलवा देंगें यानि 'सत्-चित -आनंद' स्वरुप का 
साक्षात्कार करवा देंगें. क्योंकि  वे ही तो रामदूत  भी हैं.


कहते हैं हनुमान जी सुग्रीव के सेनापति थे. सुग्रीव वह है जिसकी ग्रीवा सुन्दर हो अर्थात  जो अच्छा गायन 
करे. जो सांसारिक विषयों का गायन करे वह अच्छा गायन  नही कहलाता. लेकिन जो केवल  परम  तत्व  
का या परमात्मा का ही गायन करे वही अच्छा गायन करने वाला सुग्रीव कहलाता है. गायन  में   'प्राणायाम' 
और 'जप यज्ञ'  की प्रमुख भूमिका  हैं .ऐसा गायन जब  संगीत का  सहारा लेता है तो  'सुग्रीव' बन पाता है. 
इस प्रकार से हम कह सकते हैं कि यदि हम अच्छा गायन करना चाहें , या सुग्रीव बनना चाहें  तो  बिना 
हनुमान जी को  अपना सेनापति नियुक्त करे  ऐसा नही कर सकते हैं .सुग्रीव की मित्रता राम जी से कराने 
में  हनुमान जी ही सहायक होते हैं. 


हनुमान तत्व को सही प्रकार से समझ कर ध्याया जाये तो हमारे  बल, बुद्धि ,इच्छा शक्ति निश्चित रूप से 
ही विकसित होंगें और शुद्ध आत्म ज्ञान की प्राप्ति हमें अवश्य हो जायेगी.फिर तो सब वन ,वनस्पति,पर्वत 
आदि हमें पवित्र ही जान पड़ेंगें. इसीलिए कबीरदास जी भी अपनी वाणी में कहते हैं:-


                             सब बन तो तुलसी भये, परबत  सालिगराम
                             
                             सब  नदियें  गंगा  भई, जाना  आतम   राम  


आप सुधि जनों  ने मेरी पिछली सभी पोस्टों पर अपने अमूल्य विचार व टिपण्णी  प्रस्तुत कर हर पोस्ट 
को भरपूर  सार्थकता प्रदान की है. यहाँ तक कि मेरी  पिछली  पोस्ट 'सीता जन्म- आध्यात्मिक चिंतन-५'
को तो  अब तक की सबसे अधिक लोकप्रिय  पोस्ट बना दिया है. इसके लिए मैं आप सभी का हृदय से 
आभारी हूँ.मुझे आप सभी से बहुत कुछ सीखने को  मिल रहा है.विशेषकर डॉ. नूतन गैरोला जी, 
'Human' जी, वंदना जी,हरकीरत 'हीर' जी, शिल्पा जी , अशोक व्यास जी  ने अपने अमूल्य विचारों 
से मेरे प्रयास का मूल्य कई गुणा बढ़ा दिया है. 
  
मैं आप सब से विनम्र क्षमाप्रार्थी  हूँ कि आपके स्नेहिल आग्रह के बाबजूद यह पोस्ट मैं कुछ देरी से 
प्रकाशित कर पाया हूँ. मेरी यह कोशिश रहेगी कि  प्रत्येक  माह  मैं एक पोस्ट प्रकाशित कर दूँ.
क्योंकि व्यस्तता के कारण मैं अपनी पोस्ट जल्दी प्रकाशित नही कर पाता हूँ.इसके अतिरिक्त  
सभी सुधिजन  भी  जल्दी  जल्दी पोस्ट पर  नही आ पाते हैं.और यदि जल्दी जल्दी पोस्ट प्रकाशित 
हो तो पिछली पोस्टें उनके  पढ़ने से रह जाती हैं.मेरा उद्देश्य ब्लॉग जगत के अधिक से अधिक जिज्ञासू 
और प्रभु प्रेमी सुधिजनों से  विचार विमर्श और सार्थक सत्संग  करना है.इसलिये मैं सभी से यह भी 
विनम्र निवेदन करना चाहूँगा कि जब भी समय मिले  आप  मेरी पिछली पोस्टों का भी अवलोकन जरूर 
करें व  अपने अमूल्य  विचार   प्रस्तुत करने की कृपा करें.


यूँ तो  हनुमान लीला अपरम्पार है.फिर भी अगली पोस्ट में  हनुमान लीला का कुछ और भी चिंतन करने 
का प्रयत्न करूँगा .आशा है मेरी इस पोस्ट पर आप सभी प्रेमी सुधिजन  अपने अमूल्य विचार और अनुभव 
भरपूर प्रस्तुत  कर मुझे  अवश्य  ही अनुग्रहित करेंगें.




    

Thursday, October 20, 2011

सीता जन्म -आध्यात्मिक चिंतन -५

आनंद की परिकाष्ठा परमानन्द है.  हर  मनुष्य  में   चिंतन   मनन करने की  स्वाभाविक
प्रक्रिया होती  है.परन्तु , परमानन्द का चिंतन करना ही  वास्तविक सार्थक चिंतन है.परमानन्द
परमात्मा का स्वाभाविक रूप है ,जिससे  जुडना  'योग' कहलाता  है.  जब मनुष्य परमानन्द
के विषय में  चिंतन  मनन करता है और मन बुद्धि के द्वारा  उससे जुड़ने का  यत्न भी करता है
तो वह 'मुनि' कहलाये जाने योग्य है.

श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय ६, श्लोक संख्या ३  में वर्णित है :-

                 आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं  कर्म  कारणमुच्यते 

योग में आरूढ़ होने की इच्छा वाले मननशील पुरुष  अर्थात मुनि के लिए कर्म करना ही 
हेतू  या कारण है.

योग में तब  तक आरूढ़ नहीं हुआ जा सकता जब तक कि  परमानन्द का मनन न हो और
उसे पाने की इच्छा न हो .इसी इच्छा के उदय होने  को  हृदय में 'सीता जन्म' होना माना गया है.
योग के लिए केवल इच्छा ही नहीं कर्म भी आवश्यक है. कर्म का अर्थ यहाँ केवल ऐसे  सद् कर्म हैं
जिनके करने से  'परमानन्द' से जुड़ा जा सके.इन कर्मों के विपरीत जो भी कर्म हैं वे बंधनकारक है.
वह  सद् कर्म जो केवल परमानन्द या सत्-चित -आनंद परमात्मा को पाने की ही अभिलाषा
से किये  जाये तो  श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार 'यज्ञ' कहलाते  है.परमात्मा का 'नाम जप' करना
ऐसा ही एक सद् कर्म व यज्ञ है.

जप यज्ञ को सभी प्रकार के  यज्ञ कर्मों में सर्वोत्तम माना गया है.श्रीमद्भगवद्गीता के 'विभूति योग'
अध्याय १० में   यज्ञों में 'जप यज्ञ' को  परमात्मा की साक्षात विभूति ही बतलाया गया है.
इसलिये जप यज्ञ के विषय में थोडा जानना आवश्यक हो जाता है.

जैसे गेहूँ अनाज आदि  शरीर का अन्न हैं,  सद् भाव  मन का अन्न है और सद् विचार बुद्धि  काअन्न है,
इसी प्रकार 'जप करना' प्राण और अंत:करण का अन्न है.जप  करने से प्राणायाम होता है,प्राण लय को
धारण कर सबल होने लगता  है,जिससे चंचल मन और  बुद्धि भी  स्थिर  होते हैं.जप करना सहज और
सरल है.किसी भी अवस्था,काल ,परिस्थिति में जप किया जा सकता है.जप यज्ञ में परमात्मा का नाम
या मन्त्र जिसका जप किया जाता है , बहुत महत्वपूर्ण होता है. जिसको समझ कर  सच्चे  हृदय से जप
किये जाने से ही प्रभाव होता है.  मन्त्र या नाम में जिस जिस  प्रकार के भाव समाविष्ट होते हैं ,वे हृदय
में उदय होकर प्राण और मन का लय कराते जाते हैं. यदि नाम में हम कुभाव समाविष्ट कर  स्वार्थ के
लिए दूसरों का अहित  सोच केवल  दिखावे के लिए ही  जप करें तो 'मुहँ मे राम बगल में छुरी' वाली
कहावत चित्रार्थ होगी और बजाय योग के हम पतन की और उन्मुख हो जायेंगें.

गोस्वामी तुलसीदास जी  परमात्मा के  नाम जप के लिए यहाँ तक लिखते है कि

                चहुँ जुग चहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ , कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ 

चारों युगों में और चारो वेदों में नाम के  जप का प्रभाव  है ,परन्तु ,कलियुग में तो विशेष प्रभाव है.
नाम जप के  अतिरिक्त कलियुग में  अन्य कोई सक्षम  साधन नहीं है .चारों युग हमारे ही हृदय में
घटित होते रहते हैं.जब हृदय में कलियुग का प्रभाव होता है तो हम तमोगुण अर्थात आलस्य ,प्रमाद
हिंसा ,अज्ञान आदि  की वृतियों  से आवर्त रहते हैं.ऐसे में परमात्मा से योग के लिए नाम जप सबसे
अधिक प्रभावकारी साधन  है. युगों  के  आध्यात्मिक  निरूपण  के  सम्बन्ध  में  मेरी  पोस्ट
'राम जन्म आध्यात्मिक चिंतन-२' को भी सुधिजनों द्वारा  पढा जा सकता है.

गोस्वामी तुलसीदास जी श्रीरामचरितमानस में यह भी लिखते हैं कि

                  देखिअहिं  रूप  नाम   आधीना ,रूप  ग्यान  नहिं  नाम  बिहीना 
' रूप नाम के अधीन देखा जाता है,परन्तु  नाम के बिना रूप का ज्ञान नहीं हो सकता है.'

जैसे 'हाथी' कहते ही हाथी के रूप का भी मन में आभास होने लगता है ऐसे ही परमात्मा के नाम जप
करने से हृदय में परमात्मा के रूप यानि  'परमानन्द' का आभास  व अनुभव होने लगता है.नाम जप
चाहे निर्गुण निराकार परमात्मा का किया जाये या सगुण साकार परमात्मा का,दोनों का फल यह
'परमानन्द' का अनुभव ही है.

सुधिजनों ने पंचतंत्र  की कहानियों के विषय में सुना व पढा अवश्य होगा. कहते हैं इन कहानियों की
रचना अल्प समय में ही मंद बुद्धि  राजकुमारों को नीति ,आचार व व्यवहार  सिखाने के लिए की गई थी.
कहानियों के अधिकतर पात्र पशु पक्षी हैं ,जिनसे कहानियाँ इतनी रोचक व सरल हो गईं हैं कि उनका सार
सहज ही हृदयंगम हो जाता है.इसी प्रकार से   गूढ़ आध्यात्मिक तथ्य श्रीरामचरितमानस व  अन्य पुराणों
आदि में वर्णित कहानी व  लीला  के माध्यम  से आसानी से  ग्रहणीय हो जाते हैं.जरुरत है तो बस
इन कहानी और 'लीला' को रूचि लेकर पढ़ने की और सकारात्मक सूक्ष्म अवलोकन करके समझने की.

नाम जप के महत्व के सम्बन्ध में मैं यहाँ पर 'सीता लीला ' का एक संक्षिप्त वर्णन करना चाहूँगा.
जब हनुमान जी सीता जी की खोज करके राम जी के पास लौटे  तो राम जी ने उनसे  पूछा कि हनुमान
जी यह बतलाइये कि  लंका में राक्षस राक्षसनियों  के बीच घिरी सीता जी अपने प्राणों की रक्षा किस
प्रकार से कर रहीं हैं.तब इस प्रश्न का उत्तर हनुमान जी इस प्रकार से देते हैं (श्रीरामचरितमानस,
सुन्दरकाण्ड, दोहा संख्या ३०):-

                   नाम  पाहरू   दिवस  निसि,  ध्यान   तुम्हार   कपाट
                   लोचन  निज  पद    जंत्रित , जाहिं  प्राण   केहिं  बाट  

(१)सीताजी रात दिन नाम जप करती रहती हैं जो पहरेदार की तरह उनके प्राणों की देखभाल करता है.

(२)वे नाम जप के साथ साथ आपका ध्यान भी करती रहती  हैं.जिससे उनके प्राणों की सुरक्षा और
भी बढ़ जाती है. जैसे कि किसी घर की सुरक्षा के लिए एक पहरेदार की नियुक्ति करके, घर के दरवाजे
यानि कपाट भी बंद कर दिए जाएँ.क्यूंकि बिना कपाट बंद  किये  केवल पहरेदार से ही  घर की सुरक्षा
अधूरी रह सकती है.

(३)यही नहीं  वे नेत्रों को भी अपने चरणों में निरंतर लगाये रखतीं हैं.'चरण' जो चलने  का प्रतीक है,  में
नेत्रों को लगाने से अभिप्राय  है  कि वे  अपने किये गए व किये जा रहे कर्मों पर भी अपनी नजर रखती हैं.
यह ऐसे ही  है जैसे  कि घर में पहरेदार की नियुक्ति  के अतिरिक्त  घर के कपाट बंद करके उनमें
ताला भी लगा दिया जाये.अब बतलाइये उनके प्राण (बिना उनकी इच्छा के) किस प्रकार  से निकल पायेंगें.

इस प्रकार से भीषण विपरीत परिस्तिथियों में भी नाम जप के सहारे  सुरक्षित रह कर योग में किस
प्रकार से आरुढ हुआ जा सकता है,यह आध्यात्मिक तथ्य  उपरोक्त 'सीता लीला' के प्रकरण से सहज
ग्रहण हो  जाता है.  जप,ध्यान और निरंतर अपने कर्मों का अवलोकन करने से प्राण इतना सबल हो
जाता है कि हमारी बिना इच्छा के वह  शरीर से नहीं निकल सकता.अर्थात जप यज्ञ से  इच्छा मृत्यु भी
हुआ जा सकता है.

अंत में कबीरदास जी की निम्न वाणी  से मैं  इस पोस्ट का समापन करता हूँ.

                      खोजी  हुआ   शब्द   का,  धन्य  सन्त  जन  सोय 
                      कह कबीर गहि शब्द को, कबहूँ  न  जाये   बिगोय. 

जो  शब्द  (यानि परमात्मा के नाम) की  खोज करता है,वह  सन्त जन  धन्य हैं .कबीरदास जी कहते हैं कि
शब्द को ग्रहण करके वह कभी भी पतित  नहीं हो सकता.

सभी सुधि जनों का मैं हृदय से आभारी हूँ जिन्होंने मेरा  निरंतर उत्साहवर्धन किया है . आप सभी  की
सद्प्रेरणा  से ही  मैं  यह पोस्ट भी लिख पाया हूँ. आशा है  आपकी अमूल्य टिप्पणियों के माध्यम से
मेरा  निरंतर मार्गदर्शन होता रहेगा. जप यज्ञ  के बारे में आप सभी सुधिजनों के अपने अपने विचार व
अनुभव जानकर मुझे बहुत खुशी होगी.

मेरी सभी सुधिजनों को   आनेवाले त्यौहारों  धनतेरस, दीपावली,गोवर्धन व भैय्या दूज की  बहुत
बहुत  हार्दिक  शुभकामनाएँ व बधाई.

                  

Monday, September 12, 2011

सीता जन्म -आध्यात्मिक चिंतन -४

मन में श्रद्धा के  'जोश' और बुद्धि में विश्वास के 'होश' से 'भवानी और शिव' की कृपा होने लगती है.
भक्त वही  है जो परम  आनंद से ,परम शान्ति और संतुष्टि  से मन और बुद्धि के माध्यम से किसी
भी  प्रकार से हृदय में स्थित परमात्मा से  जुड जाये. जो नहीं जुड पाता वह 'विभक्त' है, खंडित है,
अशांत  और अस्थिर  है. श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय ४   श्लोक ३९   में वर्णित है

                           श्रद्धावाँल्लभते  ज्ञानं    तत्पर:  संयतेन्द्रिय
                           ज्ञानं लब्ध्वा परां शांतिमचिरेणाधिगच्छ्ती 

अर्थात जो श्रद्धावान है, तत्पर है ,साधनपरायण है और इन्द्रियों को संयत करता है,उसी को परमात्मा या
परमानन्द का ज्ञान भी प्राप्त होता है,जिसको प्राप्त कर  वह अति शीघ्र परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है.
और जो विवेकहीन ,श्रद्धारहित व संशय युक्त है उनके लिए श्रीमद्भगवद्गीता में वर्णित किया गया है

                           अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च  संशयात्मा   विनश्यति 
                           नायं लोकोSस्ति  न परो न सुखं संशयात्मन :

विवेकहीन , श्रद्धा रहित और  संशय युक्त मनुष्य परमार्थ को नहीं पा सकता . वह  अवश्य ही  नष्ट
भ्रष्ट हो जाता है. ऐसे संशय युक्त मनुष्य के लिए न यह लोक है, न परलोक है  और न ही सुख है.


यूँ तो परमात्मा  और परमानन्द से अनेक प्रकार से जुड़ा जा सकता है,परन्तु ,शास्त्रों में मुख्य रूप
से चार प्रकार के भक्त बताये गए हैं जो मन और बुद्धि में श्रद्धा और विश्वास उपार्जित करते हुए
परमात्मा  से जुडने का प्रयत्न करते हैं. श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं:-

                          राम भगत जग चारि प्रकारा , सुकृति चारिउ अनघ उदारा.
                          चहू चतुर कहू नाम अधारा ,  ज्ञानी प्रभुहि बिसेष  पिआरा 

जग में राम के भक्त चार प्रकार के होते हैं.चारों ही पुण्यात्मा,पापरहित और उदार हैं.चारों ही चतुर हैं
जिनको परमात्मा के नाम जप का  आधार है.इन चारों प्रकार के भक्तों में 'ज्ञानी' भक्त  प्रभु को
विशेष प्यारा है. श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय ७  श्लोक १६  में इन चार प्रकार के भक्तों को निम्न
प्रकार से वर्णित किया गया है:-

                         चतुर्विधा भजन्ते मां जना: सुकृतिनोऽर्जुन
                         आर्तो  जिज्ञासुरर्थार्थी  ज्ञानी  च  भरतर्षभ

हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! उत्तम कर्म करनेवाले मुनष्य मुझे चार प्रकार से भजते हैं.
अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी.

आईये, उपरोक्त चार प्रकार के भक्तों को कुछ और विस्तार से जानने का प्रयत्न करते है,

१)अर्थार्थी भक्त:  ऐसा भक्त जिसको परमात्मा में यह श्रद्धा और विश्वास है कि परमात्मा ही  उसकी
                           हर  मनोकामना पूर्ण करने में समर्थ है.यद्धपि वह भी सद् कर्म करता रहता है,परन्तु
                           भक्ति करते हुए  उसका उद्देश्य अपने अर्थ यानि कामना की पूर्ति की तरफ रहता है.
                           इसीलिए यह भक्त अर्थार्थी कहलाता है. यानि मतलब सिद्ध करने के लिए भक्ति.
                           अर्थार्थी भक्ति, भक्ति की प्रारंभिक अवस्था मानी जा सकती है,जिसमे भक्त का
                           परमात्मा के प्रति ज्ञान अति अल्प   है,परन्तु,उसको परमात्मा में श्रद्धा  है.

२) जिज्ञासु भक्त: ऐसा भक्त जिसकी जब मनोकामनाएं पूर्ण होने लगतीं हैं,या किसी भी  अन्य कारण
                           से जब उसके हृदय में परमात्मा को जानने की यह तीव्र अभिलाषा व उत्कंठा जाग्रत व                   
                           बलवती हो जाती है कि जो परमात्मा समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करता है,जिसने यह
                           चराचर जगत बनाया है,वह कौन है, कैसा है, उसका स्वरुप क्या है,तभी वह सत्संग,
                           सद् शास्त्रों ,संतजनों का आश्रय ग्रहण कर परमात्मा को जानने का सुप्रयत्न करता  है.

३) आर्त भक्त :    ऐसा भक्त जिसने जीवन में बहुत दुःख और कष्ट पाए हैं.संकटों में घिरा होने के कारण
                          अति कातर,दीन और आर्त होकर भगवान से जुड जाता है.उसे पूरी श्रद्धा और विश्वास है
                          कि परमात्मा ही उसके कष्टों का निवारण कर सकते है. उसका विश्वास  और सभी ओर से
                          उठ चुका होता है.जैसे पौराणिक  महाभारत की कथानुसार चीर-हरण के समय द्रौपदी
                          ने आर्त होकर  'श्रीकृष्ण' को पुकारा था.

४) ज्ञानी भक्त:  ऐसा भक्त जिसे परमात्मा के सम्बन्ध  में  सम्पूर्ण तत्व-बोध हो जाता है,सम्यक ज्ञान
                        हो जाता है,उसकी कोई जिज्ञासा  बाकी नहीं रहती.जिसकी अपनी कोई भी मनोकामना
                        नहीं रहती.जो परमात्मा को  आनंद और  प्रेम स्वरुप जानकर नित्ययुक्त हो  प्रेमानन्द
                        में ही मग्न रहता है,पूर्ण  तृप्त  और परम शान्ति को पा चुका होता है.जिसका अंत:करण
                        इतना सबल और सुस्थिर हो जाता है कि सुख - दुःख उसके  लिए कोई माने नहीं रखते.

चारों प्रकार के भक्तों में,ज्ञानी भक्त के विषय में श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय ७ के श्लोक १७ व १८  में
कहा गया है:-
                       तेषां   ज्ञानी  नित्ययुक्त   एकभक्तिर्विशिश्यते
                       प्रियो  हि  ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं  स   च   मम  प्रिय:
                       उदारा:  सर्व  एवैते  ज्ञानी    त्वात्मैव  मे   मतम् 
                       आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् 

उनमें ( चारों प्रकार के भक्तों में ) मुझे में एकीभाव से स्थित अनन्य प्रेमभक्ति वाला ज्ञानी भक्त अति
उत्तम है,  क्यूंकि मुझको तत्व से जाननेवाले ज्ञानी को मैं अत्यंत प्रिय हूँ  और  वह ज्ञानी मुझे अत्यंत
प्रिय है. ये (चारों) भक्त  उदार हैं, परन्तु ज्ञानी तो साक्षात मेरा स्वरुप ही  है,ऐसा मेरा मत है. क्यूंकि ज्ञानी
की गति केवल मेरे में ही है,मेरे में ही वह मन ,प्राण और बुद्धि को लगाये रखता है.उत्तम गतिस्वरूप
ज्ञानी भक्त मुझमें ही अच्छी प्रकार से स्थित है,यानि वह भी आनंदस्वरूप ही है.

जब हम बिना मन और बुद्धि को परमात्मा में लगाए ,बिना  श्रद्धा और विश्वास के परमात्मा की
भक्ति का ढोंग करते हैं,ढोंगी का भेष धारण करते हैं  तो श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार मिथ्याचारी
कहलाते  है.आज समाज में अधिकतर मिथ्याचारियों  का ही बोलबाला है. जिससे आम बुद्धिजीवी
का विश्वास संतों से ही नहीं ,परमात्मा तक से  भी  उठता  चला जा रहा  है.बुद्धिमान ढोंगी के   भेष
और सच्ची  भक्ति का अंतर समझ जाते है,कहा गया है ;

                      भक्ति कठिन अति दुर्लभ, भेष सुगम नित होय 
                      भक्ति जु न्यारी भेष  से , यह  जानै  सब   कोय 

मिथ्याचार को छोड़ कर यदि  हम उपरोक्त   चार प्रकार के भक्तों के बारे में सही प्रकार से जाने तो
हम यह तय कर सकते हैं कि  अभी हमारी भक्ति किस स्तर की है.भक्त बनने से पहले हमें हर हालत
में सुकृत तो करने ही होंगें. बिना सुकृत किये हम किसी प्रकार से भी भक्त कहलाये जाने के अधिकारी
नहीं हो सकते हैं.

यदि हम अभी अर्थार्थी या आर्त भक्त की श्रेणी में  हैं तो   परमात्मा को जानने की तीव्र उत्कंठा जगाकर
जिज्ञासु बनने का प्रयत्न भी  कर सकते हैं.जिज्ञासु भक्त ही एक न एक दिन राम कृपा से ज्ञानी भक्त
हो जायेगा इस विश्वास से जीवन में आगे बढ़ने का प्रयत्न करें  तो ही जीवन का  वास्तविक सदुपयोग है
संत कबीरदास जी  कहते हैं:-

                    भक्ति बीज पलटे  नहीं ,जो जुग जाये अनन्त 
                    ऊँच नीच  घर अवतरै,   होय   संत   का   संत 

अर्थात की हुई भक्ति का बीज कभी भी निष्फल नहीं होता. चाहे अनन्त युग बीत जाएँ ,भक्तिमान जीव
ऊँच  नीच माने गए चाहे किसी भी वर्ण या जाति में उत्पन्न हो,प्रारब्ध वश चाहे किसी भी योनि में उसे जाना
पड़े पर अंततः वह संत ही रहता है.  उसका अंत हमेशा अच्छा ही होता है.अर्थात उसकी परम गति हो
उसे परमानन्द की प्राप्ति होकर रहती है.

सीता जन्म आध्यात्मिक चिंतन की पिछली तीनों पोस्टों पर आप सुधिजनों द्वारा की गई टिप्पणियों
से हृदय में इस आशा और विश्वास का सुखद  संचार होता है कि हम सभी मिथ्याचार को छोड़कर  अपने
हृदय में भक्ति  जिज्ञासा   की जोत  प्रज्जवलित करने में जरूर जरूर सफल होंगें.

यह पोस्ट भी कुछ  लंबी हो गई है.इसलिये इस बार बस यहीं समाप्त करता हूँ.आप सुधिजनों ने मेरी
इस लंबी पोस्ट को पढ़ने का जो कष्ट उठाया है  ,इसके लिए मैं आपका हृदय से आभारी हूँ.मैं आप सभी
से यह भी अनुरोध करूँगा कि विषय को भली प्रकार से समझने के लिए आप समय मिलने पर  मेरी
पिछली पोस्टों का अवलोकन भी जरूर करते रहें.

अगली पोस्ट में, यदि हो सका तो नाम जप और 'सीता लीला'  पर  कुछ और आध्यात्मिक चिंतन
करने की कोशिश करूँगा. आशा है आप सब सुधिजन अपने सुविचारों को प्रकट कर   मेरा उत्साह
वर्धन करते रहेंगें.