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Sunday, April 27, 2014

श्रीमद्भगवद्गीता-चिंतन - १

ऊँ ...........................    ऊँ ...........................  ऊँ ...........................     

ऊँ   सहनाववतु     l    सहनौभुनक्तु
सहवीर्यं करवावहै   l    तेजस्विनावधीतमस्तु मा  विद्धिषावहै  l l

अखण्डमंडलाकारं  व्याप्तं येन चराचरम्  l
तत्पदं दर्शितं  येन  तस्मै श्री  गुरवे  नम:  l l

ऊँ  पार्थाय  प्रतिबोधितां  भगवता   नारायणेन  स्वयं
व्यासेन-ग्रथितां पुराण   मुनिना मध्ये महाभारतम्  l
अद्धैतामृतवर्षिणीम्     भगवतीमष्टादशाध्यायिनीम् 
अम्ब  त्वामनुसंदधामि  भगवद्गीते    भवद्वेषनीम्   l l

वसुदेवसुतं   देवं          कंसचाणूर   मर्द्नम्  l
देवकी परमानन्दम् कृष्णं वन्दे  जगत्गुरुम्  l l

हमारे यहाँ प्रत्येक मंगलवार को सांय ७ बजे से ८ बजे के मध्य उपरोक्त मंत्रोच्चारण के साथ व  
३ मिनट तक ईश्वर ध्यान उपरान्त गीता गोष्ठी का शुभारम्भ होता है.

सर्वप्रथम ईश्वर क्या है इसका चिंतन हमें करना चाहिये.
हम सभी जीवन में आनन्द चाहते हैं. दुःख के  चिंतन  से आनन्द की अनुभूति नही हो सकती है.

आनन्द की अनुभूति के लिए आनन्द का चिंतन करना परमावश्यक है.
आनन्द  में भी आनन्द की सर्वश्रेष्ठ श्रेणी का ही चिंतन होना चाहिये.तभी हमारा चिंतन सार्थक हो सकता है.
आनन्द की सर्वश्रेष्ठ श्रेणी में ऐसा आनन्द नही हो सकता जो समय से बाधित हो,अल्पकालीन हो.,
जिसका समय के साथ कभी अंत होता हो या जो हमारी  चेतना को कम  करनेवाला हो.

विषयों से प्राप्त आनन्द अल्पकालीन तो  हो सकता है,परन्तु सर्वश्रेष्ठ श्रेणी का नही.
विषयों से प्राप्त  आनन्द वास्तव में चेतना को  विलुप्त करता है और  अंततः दुःख  प्रदान  कराने वाला होता है,जो मृगमरीचिका की तरह जीवनभर  भटकाता ही रहता  है.

आनन्द की सर्वश्रेष्ठ श्रेणी  का आनन्द केवल  'सत् - चित् - आनन्द' ही हो सकता है.जिसके आश्रय
में हम सदा आनन्दित रह सकते हैं.

सत्   यानि हमेशा हमेशा (for ever),  चित्  यानि चेतनायुक्त अथवा चेतनापूर्ण- जिससे निरंतर चेतना 
मिलती हो व हमारी चेतना का विकास होता हो . ऐसे सत्  चित् युक्त आनन्द को  'सत्- चित् -आनन्द' या सच्चिदानन्द कहते है.

हमारे  शास्त्रों में सच्चिदानन्द को ही ईश्वर या ब्रह्म नाम से बताया गया है.

जिस प्रकार से विभिन्न विषयों की जानकारी के लिए उन उन विषय पर प्रमाणिक ग्रंथों का 
अध्ययन आवश्यक है. जैसे भौतिक विज्ञान की जानकारी के लिए भौतिक शास्त्र है  ,गणित की 
जानकारी के लिए गणित शास्त्र  है  ,इसी प्रकार 'सत् - चित् - आनन्द'  की जानकारी के लिए 
श्रीमद्भगवद्गीता  भी एक  शास्त्र है.

श्रीमद्भगवद्गीता 'ब्रह्म विद्या' को जनाने वाला ग्रन्थ है.यह ब्रह्म  यानि सत्- चित् -आनन्द के 
ज्ञान कराने के साथ साथ सत्--चित्-आनन्द  से हमें जोड़ती भी  है.इसीलिए श्रीमद्भगवद्गीता
को 'योग शास्त्र' भी कहते हैं.  श्रीमद्भगवद्गीताके  ज्ञानामृत रुपी दुग्ध पान से हमारा अंत:करण निरंतर पुष्ट होता है   और अंततः जो हमें अद्द्वैत का  बोध करादे  यानि हममें  व सच्चिदानंद में कोई भेद ही न रह जाये ऐसा योग करा दे  ,उसको यदि हम 'अम्ब' या 'माँ' पुकारें तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी.भगवद्गीता में कुल १८ अध्याय है. प्रत्येक अध्याय एक 'योग' के रूप में वर्णित है.इसलिए  भवद्वेष यानि negativity के निवारण के लिए और positive अंत:करण के  विकास  के लिए यानि सच्चिदानन्द से योग के लिए श्रीमद्भगवद्गीता के   १८ (अष्टा दश ) अध्यायों का  निरंतर अनुसंधान करना ही चाहिये .

अत : उपरोक्त मंत्रोच्चारण में निम्नलिखित पंक्तियों का  स्मरण करते हुए हम सभी मिल कर श्रीमद्भगवद्गीता का अध्ययन,मनन और चिंतन करने का पुनः पुनःप्रयास करते रहेंगें.

अद्धैतामृतवर्षिणीम्     भगवतीमष्टादशाध्यायिनीम् 
अम्ब  त्वामनुसंदधामि  भगवद्गीते    भवद्वेषनीम्   l l

Wednesday, January 1, 2014

नववर्ष २०१४ का मंगलमय स्वागत है.

मेरा ब्लॉग  पर  पूरे एक वर्ष  के  पश्चात आना  हो पा रहा  है. इस बीच कई महत्वपूर्ण  घटनाएं   घटित हुईं. मेरे  स्वास्थ्य  में  उतार चढाव  होते रहने  के साथ साथ ही मेरे  ससुर जी  का देहांत  मार्च  २०१३ में हो गया. मेरी पत्नी उनकी एक मात्र  संतान   हैं . कई साल से  वे गंभीर रूप से बीमार चल रहे थे और उनकी देखभाल का  पूरा जिम्मा  हमारा  ही था .उनकी मृत्यु  से  कुछ क्षण पूर्व  ही मेरे  पुत्र  
पारस  का अमेरिका  से आना  हो पाया था .  उन्होंने आखरी सांस  अपने  एक मात्र  प्रिय धेवते  पारस  और धेवती ( मेरी  पुत्री निधि) के हाथों  में ली. यह एक  विलक्षण संयोग  था.उनकी यह परम इच्छा थी कि अंतिम समय में वे अपने धेवते को  देख पायें और उनके शरीर  का  अंतिम संस्कार  भी  उसी के हाथ से हो. परम करूणामय प्रभु ने  उनकी  इच्छा  को पूर्ण किया. पारस का अमेरिका से बहुत ही कम समय के नोटिस पर उनके पास  आ जाना चमत्कार से कम नही था.उनकी यह भी इच्छा  थी  कि  पारस  की   शादी जल्द  से जल्द  हो जाये. प्रभु ने उनकी यह इच्छा भी पूर्ण  की. मेरे पुत्र पारस का शुभ  विवाह  माह अक्तूबर  की १८ तारीख को  शरद पूर्णिमा के दिन संपन्न हुआ.मेरी  पुत्री  निधि का विवाह भी ३ वर्ष पूर्व  माह अक्टूबर  में शरद पूर्णिमा के दिन ही संपन्न हुआ था.मेरे  ऊपर  दयामय  प्रभु की अति कृपा रही है कि में ब्लॉग पर  आकर आप सब सुधि जनों से एक बार फिर से संवाद कर पा रहा हूँ. 


         गीता का उल्लेख मैंने अपने  ब्लॉग की  प्रथम पोस्ट   'ब्लॉग  जगत में मेरा पदार्पण ' में किया  था मंगलवार  के  शुभ दिन   लगभग ११  वर्ष  पूर्व  प्रत्येक सप्ताह मेरे  घर  पर   गीता गोष्ठी होती आ रही है जिसमें  श्रीमद्भगवद्गीता का मनन  और चिंतन किया जाता रहा है.मेरी  हार्दिक इच्छा है कि  श्री मदभगवतगीता  रुपी महान ग्रन्थ का कुछ मनन चिंतन  मैं अपने  ब्लॉग  पर भी प्रारम्भ  करने का प्रयास करूँ..आशा है आप सभी सुधीजनो के शुभ संयोग  और सहयोग से यह  सम्भव हो सकेगा.नववर्ष का प्रारम्भ   यदि  सद्विचारों , सद्भावों  और सद्कर्मों  से  हो सके  तो  यही  नववर्ष का सच्चा स्वागत होगा.आइये हम सब मिलकर  अपने अपने सद्विचारों और सद्भावों को प्रकाशित और प्रसारित करते हुए   नववर्ष  २०१४ का  मंगलमय स्वागत करें.


मेरी आप सभी  सुधिजनों  को नववर्ष २०१४  की  बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाएँ.

राकेश कुमार 
३१.१२.२०१३ 

Monday, December 31, 2012

नववर्ष की शुभकामनाएँ

मुझे बहुत ही हार्दिक संतोष और  प्रसन्नता मिली कि मेरी स्वस्थता के लिए आप सभी सुधि जनों ने
मुझे   शुभकामनाएँ दी. इसके लिए मैं आप सभी का दिल से आभारी हूँ और हृदय से कामना
करता हूँ कि नव वर्ष में हम सभी विषाद से सर्वथा मुक्त हो आनन्द ,शान्ति और  उन्नति की ओर
निरंतर अग्रसर हो.मुझ से जो भी भूल  या त्रुटियाँ  हो गयी हों उन सब के लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ.

मेरी आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ.

राकेश कुमार.

Wednesday, October 31, 2012

अल्पकालीन विराम

अपनी कुछ अस्वस्थता के कारण  मैं ब्लोगिंग  में सक्रिय  रहने में  स्वयं को असमर्थ
पा रहा हूँ.इसलिए अभी ब्लोगिंग से अल्पकालीन विराम ले लेना ही बेहतर समझता
हूँ. मैं अपने उन सुधिजनों का क्षमाप्रार्थी हूँ जिन्होंने मुझ से नवीन पोस्ट लिखने  का आग्रह
किया था अथवा जिनको मेरी पोस्ट का इन्तजार है.स्वस्थ होने पर आप सब के समक्ष
पुन: उपस्थित हूँगा.

सभी सुधि जनों को  दीपावली की बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाएँ.

Sunday, September 30, 2012

हनुमान लीला भाग-६

                                            बुद्धिहीन तनु  जानकर, सुमिरौं   पवन  कुमार 
                                            बल बुधि  बिद्या देहु मोहिं,हरहु कलेस बिकार 

मैं  स्वयं को बुद्धिहीन तन जानकर पवन कुमार  हनुमान जी का स्मरण करता हूँ जो मुझे   बल,बुद्धि और विद्या प्रदान कर मेरे समस्त क्लेश विकारों को हर लें.

साधरणतः जीवन का परम लक्ष्य और उसको पाने का साधन न जानने के कारण हम  'मूढ़' अर्थात बुद्धिहीन ही होते हैं.बुद्धिमान वही है जिसको  जीवन का लक्ष्य और उस ओर चलने के साधन का भलीभांति  पता है और जो परम् लक्ष्य की तरफ चलने के लिए निरंतर प्रयत्नशील भी है.

परन्तु, परम लक्ष्य की ओर चलना इतना आसान नही है.इसके लिए  बल,बुद्धि,विद्या का प्राप्त होना और क्लेशों का हरण होते रहना अत्यंत आवश्यक है.यह सब  हनुमान जी, जो  वास्तव में 'जप यज्ञ'  व 'प्राणायाम' का साक्षात ज्वलंत  स्वरुप ही हैं, के  स्मरण और अवलम्बन से  सरलता से सम्भव  होता है.

हनुमान लीला भाग-५  में हमने हनुमान लीला के सन्दर्भ में श्रीमद्भगवद्गीता के निम्न श्लोक की व्याख्या का प्रयास किया था:-

                                        निर्मानमोहा  जित संगदोषा,    अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः
                                        द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदु:खसंज्ञैर ,गच्छ्न्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् 

श्रीमद्भगवद्गीता में परम् लक्ष्य को ही 'पदमव्ययं' (पदम् +अव्ययं)  यानि  कभी भी व्यय न होने वाले  पद  को कहा  गया है.यह वास्तव में 'सत्-चित-आनन्द' या राम को पा जाने की स्थिति ही है.पदमव्ययं की तरफ  'मूढ़' होकर कदापि भी नही चला जा सकता. इसके लिए  'अमूढ़ ' होना परम आवश्यक है.इसीलिए तो उपरोक्त
श्लोक में कहा गया है 'गच्छन्ति + अमूढाः  पदम्  अव्ययं  तत्'  यानि 'अमूढ़' ही कभी क्षीण न होने वाले उस 
अव्यय पद की ओर जाते हैं'.

श्रीमद्भगवतगीता में 'मूढ़ता'  की विभिन्न स्थितियों का जिक्र हुआ है.जैसे कि

'विमूढ' -  जिसमें विवेकशक्ति लगभग शून्य हो.

'मूढ़'     - जो थोड़ी बहुत विवेक शक्ति  रखता हो, परन्तु जो अपनी मूढता को  पहचानने में असमर्थ हो.      
             
'सम्मूढ' - जो मूढ़ तो हो परन्तु अपनी मूढता का आत्मावलोकन कर सके.

जैसा कि अर्जुन ने भगवान कृष्ण की  शरण में आने से  पूर्व  'कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः, पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः' कहकर किया.अर्जुन ने अपना आत्मावलोकन  करने के पश्चात स्वीकार किया कि वह कायरतारूपी दोष से ग्रसित है और धर्म को न  जानते हुए 'सम्मूढ' ही है,इसलिए वह भगवान कृष्ण से 'श्रेष्ठ और निश्चित (Permanent)कल्याणकारी' मार्ग बतलाने की  याचना करता है.

अमूढ़  -  जिसकी मूढ़ता सर्वथा समाप्त हो गई है.यानि जो विवेक शक्ति से संपन्न हो जीवन के परम
              लक्ष्य को और उस ओर जाने के साधन को भलीभाँति जानता है.

हनुमान जी की भक्ति से हम  विमूढ़  से मूढ़ , मूढ़ से 'सम्मूढ' और 'सम्मूढ' से  'अमूढ़ ' होकर 'गच्छ्न्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्' यानि जीवन के परम लक्ष्य की ओर जाने का सच्चा और सार्थक प्रयास कर सकते हैं. याद रहे अर्जुन ने भी अपने रथ पर कपिध्वज को ही धारण किया था,जिस कारण वह श्रीमद्भगवद्गीता रुपी दुर्लभ अमृत ज्ञान का रसपान कर सका.

निर्मान,अमोहा, जित्संग दोषा,अध्यात्म नित्या की व्याख्या हमने 'हनुमान लीला भाग-५' में की थी.सुधिजन चाहें तो हनुमान लीला भाग-५ का पुनरावलोकन कर सकते हैं. यहाँ मैं इतना स्पष्ट करना चाहूँगा 'निर्मान' होना अपने को ही मान देने की प्रवृति  से सर्वथा मुक्त हो जाना है. क्यूंकि जब हम स्वयं को कोई मान देते हैं और दुसरे उस मान को अनदेखा कर कोई मान नही देते हैं या उससे कम मान देते हैं तो हम 'अपमानित' महसूस कर सकते हैं और हममें क्रोध या  'Inferiority complex' का संचार हो जाता है.इसी प्रकार यदि हमारे स्वयं के दिए हुए मान से दुसरे हमें अधिक मान देते हैं तो हम अपने को 'सम्मानित' महसूस कर सकते हैं जिससे हममें 'अहंकार' या 'Superiority complex' का संचार हो जाता है. Inferiority या  Superiority complex दोनों ही अध्यात्म पथ में बाधक हैं. परम श्रद्धेय हनुमान जी ने लंका में विभीषण से मित्रता करते वक़्त  उनके साधू लक्षण को पहचानते हुए 'एही सन हठ करिहऊँ पहिचानी' के principle का  अवलंबन किया और  'Superiority complex' का सर्वथा  त्याग करते हुए कहा 'कहहु कवन मैं परम कुलीना,कपि चंचल सबहीं बिधि हीना'.  इसी प्रकार राक्षसों द्वारा बाँधे जाने,लात घूंसे खाते घसीट कर ले जाते हुए भी उन्होंने 'Inferiority complex' का सर्वथा त्याग करके  मन बुद्धि को अपने रामदूत होने के कर्म को करने में यानि 'रावण से मिलने व उसको रामजी  का सन्देश देने ' के लक्ष्य पर ही केंद्रित किये रखा.  

आईये अब उपरोक्त श्लोक में वर्णित  शेष तीन साधनाओं ( विनिवृत्तकामाः, द्वन्द्वैर्विमुक्ताः, सुखदु:खसंज्ञैर  ) की व्याख्या करने की कोशिश करते हैं :-

 विनिवृत्तकामाः -  

परम  अव्ययं पद की ओर अग्रसर होने के लिए हर प्रकार की सांसारिक कामना से   विनिवृत्त होना अति आवश्यक  है.विनिवृत्त कामना का भोग करने से नही हुआ जा सकता बल्कि इससे कामना और भी भड़क उठती है.छोटी कामना का शमन उससे बड़ी,अच्छी और प्रबल कामना को अर्जित करके किया जा सकता है.सत् चित आनन्द को  पाने की कामना जब सर्वोच्च हो अत्यंत प्रबल हो जाती है तो चित्त में सांसारिक कामनाओं का वेग व प्रभाव स्वयमेव ही घटने लगता है.इसलिए  विनिवृत्तकामाः होने के लिए  पदम अव्ययं पद के लक्ष्य को ध्यान  में रखते हुए उसी को पाने की निरंतर कामना करते रहना होगा. 

 द्वन्द्वैर्विमुक्ताः  - 

हृदय में द्वन्द की स्थिति से मुक्ति पाना  अत्यंत आवश्यक है.जब यह करूँ यह न करूँ की स्थिति होती है तो लक्ष्य की ओर अग्रसर होना बहुत ही मुश्किल होता है.इसलिए श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है  'व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह' यानि असली व्ययसाय करने वाली बुद्धि एक ही होती है,जो कि निश्चयात्मक  कहलाती  है.बुद्धि का असली व्यवसाय है सद विचार करना , सत्-चित-आनन्द का सैदेव चिंतन करना.Temporary या क्षणिक आनन्द का चिंतन बुद्धि को अव्यवसायी बना देता  है. क्यूंकि Temporary आनन्द अनेक और अनंत हो सकते है,जिससे हृदय में द्वन्द की स्थिति पैदा हो जाती है.परन्तु Permanent आनन्द केवल एक   ही होता है,जिसे सत्-चित आनन्द के नाम से जाना जाता है.हर चिंतन कर्म में जब सत्-चित-आनन्द की प्राप्ति का ध्येय रह जाता है तो द्वंदों से मुक्ति  मिलना आसान होता जाता   है.

सुखदु:खसंज्ञैर    -  

जीवन में सुख दुःख की स्थिति कभी भी एक सी नही रहती.जब सब कुछ मन के अनुकूल होता है तो सुख का 
अनुभव होता है और जब भी कुछ मन के प्रतिकूल होता है तो दुःख का अनुभव होता है. अमूढ़  अपने मन की स्थिति को समझ कर मन में परिवर्तन आसानी से कर लेता है. वह मन की प्रतिकूलता को अपने सद-चिंतन से अनुकूलता में परिवर्तित करना जानता है.सुख में वह प्रमादित नही होता और दुःख में भी वह परमात्मा की  किसी छिपी सीख का ही अनुभव करता हुआ सुख का ही अनुभव करता  है. इस प्रकार परम अव्ययं पद की यात्रा अमूढ होकर सुख दुःख का संग लेते हुए धैर्यपूर्वक करनी होती है.  


जैसा की उपरोक्त श्लोक  में बताया गया है उपरोक्त सभी साधनाओं में असीम बल,व्यवसायात्मिका बुद्धि,सद विद्या की प्राप्ति और समस्त कलेशों का हरण होते रहने की परम आवश्यकता है.हनुमान लीला भाग-१,
हनुमान लीला भाग-२ ,हनुमान लीला भाग-३,  हनुमान लीला भाग-४हनुमान लीला भाग-५ और इस पोस्ट  के माध्यम से मैं हनुमान जी का ध्यान करते हुए यही प्रार्थना  करता हूँ कि वे हम सब को  'अमूढ़' बनाकर हम में वांछित बल,बुद्धि,विद्या प्रदान कर हमारे समस्त क्लेशों का हरण कर हमें पदम् अव्ययं पद यानि  राम,पूर्णानन्द की  प्राप्ति की ओर अग्रसर करें.क्योंकि हनुमान जी के लिए कुछ भी दुर्लभ नही है.


                                             दुर्गम काज जगत के जेते ,सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते 
                                             राम  दुआरे तुम रखवारे, होत  न  आज्ञा  बिनु पैसारे 

आशा है हम सब जप यज्ञ और प्राणायाम का आश्रय लेकर हनुमान जी का दामन सदा ही थामें रखेंगें.

                                                                     jai Hanumaan 
                                                                       जय श्री राम
                                                                    Jai Shri Ram
                                                                       जय हनुमान 

                                               






Sunday, August 5, 2012

फालोअर्स और ब्लोगिंग

मेरी पिछली पोस्ट  'हनुमान लीला भाग-५'  में  प्रेम सरोवर जी और डॉ. टी एस दराल जी  ने मुझे  विषयान्तर  और विषय में विविधता लाने की सलाह दी है. मुझे लेखन का अधिक अभ्यास नही है.अभी तक जो विषय मुझे दिल से  प्रिय है, उसी पर मैंने अपनी सोच आप सभी सुधि जनों के समक्ष रक्खी और आप सुधि जनों ने  उसका स्वागत  ही नही किया बल्कि सुन्दर टिप्पणियों से  मेरा भरपूर उत्साहवर्धन भी किया है . 'हनुमान लीला' की अगली कड़ी आपके समक्ष प्रस्तुत करने से पहले,मेरा विचार है कि इस बार  कुछ विषयान्तर कर लिया जाये .

इस पोस्ट में मैं 'ब्लोगिंग में 'फालोअर्स' का क्या महत्व है'  पर मैं आप सभी के विचार जानना चाहूँगा.

मई २०१२ में मुझे अमेरिका जाने का अवसर प्राप्त हुआ था. मैं सरू सिंघल जी के ब्लॉग 'Words' का फालोअर
और रीडर रहा हूँ,जो अमेरिका में न्यू जर्सी में रहती हैं.मैं  अमेरिका की  प्रमुख  हिंदी चैनल 'ITV'  के Director अशोक व्यास जी के ब्लॉग Naya Din Nayee Kavita का भी फालोअर और रीडर हूँ,जो न्यूयॉर्क  में रह रहे हैं.मैंने अपने अमेरिका के प्रोग्राम की सूचना जब सरू सिंघल जी और अशोक व्यास जी को दी तो दोनों ने ही मेरे अमेरिका आने का दिल से स्वागत किया  और अमेरिका में हम तीनों को न्यूयॉर्क में  मिलने का सुअवसर मिला.इस मिलन में अशोक व्यास जी ने सरू जी और मुझ से हिंदी  ब्लोगिंग पर अपने विचार और अनुभव प्रस्तुत करते हुए ITV  चैनल के लिए एक प्रोग्राम शूट करने का प्रस्ताव किया,जिसके फलस्वरूप ३१ मई २०१२ को सरू जी और मुझे   ब्लोगिंग के बारे में अपने विचार और अनुभव प्रस्तुत करने का ITV चैनल पर सुनहरा  मौका मिला. इसका श्रेय मैं ब्लोगिंग में अपनी 'फालोइंग' और 'रीडिंग' को ही देना चाहूँगा.

क्योंकि सरू जी और अशोक जी के ब्लोग्स की फालोइंग से ही समय समय पर मैं  इनके द्वारा लिखी गयी पोस्ट पढ़ पाया और फिर आपसी विचारों के आदान प्रदान से मुझे निकटता और घनिष्ठता का अनुभव हुआ..

मेरे और सरू जी के  इंटरव्यू का यू ट्यूब लिंक    http://youtu.be/IcWHN6UzHKI  अशोक व्यास जी  ने
दिया है.जिसका अवलोकन आप सभी सुधिजन कर सकते हैं.इस इंटरव्यू में मैंने और सरू जी ने
'ब्लोगिंग में फालोअर्स की महत्ता' के बारे में भी अपने अपने विचार  प्रकट किये हैं. यह इंटरव्यू करीब
२५-२६ मिनिट का है. जो भी सुधिजन इसे पूरा देखना चाहें वे पूरा देखें.लेकिन जिन के पास समय का
अभाव है उनसे मेरा अनुरोध है कि वे अंतिम के १० मिनिट का इंटरव्यू अवश्य देखें.

इस इंटरव्यू पर निधि जी ने उक्त यू ट्यूब लिंक पर अपने निम्नलिखित विचार प्रस्तुत किये हैं.

Readers are a subset of Followers only. Followers like what you write on your blog, no matter how these followers were made...among these, there are some genuine ones who truly like your style of writing & want to keep themselves up-to-date about your blog. They may not read you due to various constraints (time, language). They can't be totally ignored and disregarded. After all, a superstore's popularity is determined not only by buyers but by the footfalls, window shoppers & loiterers too!


किसी भी ब्लॉग को 'रीडिंग' करने में उसके 'फालोइंग' करने से बहुत सुविधा हो जाती है.मेरी समझ में किसी भी  ब्लॉग पर बहुत से फालोअर्स को देखकर उस ब्लॉग को सम्मानित दृष्टि से भी देखा जाता है. ब्लॉग के अधिकतर रीडर्स 'फालोअर्स' में से ही होते हैं.यह जरूरी नही है कि सभी फालोअर्स हमेशा 'रीडर'  बने रहें.इसके बहुत से कारण हो सकते हैं. फालोअर्स के पास समयाभाव, फालोअर्स के ब्लॉग पर ब्लोगर का  न जा पाना,फालोअर्स की  रूचि में परिवर्तन होना,पोस्ट की भाषा और विषय को फालोअर्स द्वारा न समझ पाना, ब्लोगर  और फालोअर्स के बीच कोई मतभेद हो जाना आदि आदि.

मुझे अपने ब्लॉग के सभी फालोअर्स बहुत  अच्छे लगते हैं.हालाँकि न तो  सभी फालोअर्स के ब्लोग्स पर मैं जा पाता हूँ और न ही सभी फालोअर्स मेरे ब्लॉग पर आ पाते हैं,परन्तु फिर भी मुझे मेरे फालोअर्स  प्यारे  है.रीडर्स और फालोअर्स दोनों के बढते रहने से मेरा उत्साहवर्धन होता है.फालोअर्स मेरे लिए सम्मानित अतिथि हैं,जिनको अपने ब्लॉग पर देख कर मुझे  हर्ष होता है.स्वस्थ ब्लोगिंग की दृष्टि से क्या फालोअर्स को बिलकुल नजरअंदाज किया जाना  चाहिये ? क्या फालोअर्स  जो रीडर नही हैं को भी रीडर बनने के लिए, यदि  संभव हो सके, प्रोत्साहित नही किया जाना चाहिये ? क्या रीडर्स को फालोअर्स बनने के लिए आमंत्रित नही किया जाना चाहिये ? क्या फालोइंग का आमंत्रण देने में कोई हानि है?मेरी समझ में तो ब्लोगिंग बिना फालोइंग और रीडिंग  के अधूरी सी ही है.

सरू जी , मेरे और निधि जी के विचार आपके समक्ष प्रस्तुत हैं. सरू जी के  पाठकों ने अपने अपने विचार उनकी पोस्ट   "Discussion on Blogging on ITV Gold": पर प्रस्तुत किये हैं.

'ब्लोगिंग  में फालोअर्स का  क्या महत्व  है' पर आप सुधि जनों के  विचार और अनुभव भी  मैं अपनी इस पोस्ट पर विशेष रूप से जानना चाहूँगा.

कृपया, अपने  बहुमूल्य विचारों और अनुभवों से   उचित  मार्गदर्शन  कीजियेगा.
.


  

Friday, June 29, 2012

हनुमान लीला भाग-५

                         जय जय जय हनुमान गोसाँई, कृपा करहु गुरुदेव  की नाईं

मेरी पोस्ट ' हनुमान लीला भाग -१'  में हनुमान जी के स्वरुप का चिंतन करते हुए मैंने लिखा था

' हनुमान जी  वास्तव में 'जप यज्ञ'  व 'प्राणायाम' का साक्षात ज्वलंत  स्वरुप ही हैं.साधारण अवस्था में  हमारे  मन, बुद्धि,प्राण अर्थात हमारा अंत:करण  अति चंचल हैं जिसको कि  प्रतीक रूप मे हम वानर या कपि भी 
कह सकते हैं. लेकिन जब हम 'जप यज्ञ'  व  'प्राणायाम ' का सहारा लेते हैं तो  प्राण सबल होने लगता है. 


'हनुमान लीला भाग -२' में यह चर्चा की थी  कि


जीव जब दास्य भाव ग्रहण कर सब कुछ राम को सौंप केवल राम के  कार्य यानि आनंद का संचार और विस्तार करने के लिए पूर्ण रूप से भक्ति,जपयज्ञ , प्राणायाम  व कर्मयोग द्वारा नियोजित हो राम के अर्पित हो जाता है तो उसके अंत: करण में   'मैं' हनुमान भाव  ग्रहण करने लगता है. तब वह  भी मान सम्मान से परे होता जाता है और 'ऊँ  जय जगदीश हरे  स्वामी जय जगदीश हरे ...तन मन धन  सब है तेरा स्वामी सब कुछ है तेरा, तेरा तुझ को अर्पण क्या लागे मेरा ..'  के शुद्ध  और सच्चे  भाव उसके  हृदय में  उदय हो  मानो वह हनुमान ही होता  जाता है.


'हनुमान लीला भाग -३' में मोह और अज्ञान का जिक करते हुए लिखा था 


समस्त अनिश्चिंतता,भय संदेह ,असुरक्षा का कारण 'मोह' अर्थात अज्ञान है,अज्ञान के साथ अभिमान
अर्थात यह मानना कि मुझे किसी आश्रय की आवश्यकता नही है अत्यंत शूलप्रद और कष्टदायी होता है


'हनुमान लीला भाग-४' में वर्णन किया था 


हनुमान जी का चरित्र अति सुन्दर,निर्विवाद और शिक्षाप्रद है,


भगवान की शरणागति को प्राप्त हो जाना  जीवन की सर्वोत्तम और  सुन्दर उपलब्धि है.  हनुमान की शरणागति  सर्वत्र सुंदरता का  दर्शन करानेवाली है,


उपरोक्त  बातों को अपने  मन मे रखकर , हनुमान जी का गुरु रूप में ध्यान करते हुए,इस पोस्ट में मैं श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय १५  के श्लोक ५ में वर्णित तथ्यों  और व्याख्या का अवलंबन करते हुए' हनुमान लीला द्वारा कैसे परम पद यानि परमानन्द की स्थिति तक पहुँचा जा सकता है, उस साधना का उल्लेख करना चाहूँगा. परम पद या परमानन्द की यह स्थिति अव्यय है, अर्थात सदा ही बनी रहने वाली है. यह पद व्यय रहित है इसीलिए  'अव्यय' कहलाता  है ,कभी भी क्षीण होने वाला  नही है.जबकि सांसारिक हर सम्पदा या पद कभी न कभी क्षीण हो जाने वाला होता है .यहाँ तक कि 'स्वर्ग' लोक तक का सुख भी एक दिन पुन्य कर्मों के व्यय हो जाने पर क्षीण हो जाने वाला है.इसलिए इस व्यय रहित परमानन्द रुपी अव्यय  पद तक पहुंचना हम सबका ध्येय होना चाहिए.


श्रीमद्भगवद्गीता का  श्लोक निम्न प्रकार से है :-


                            निर्मानमोहा  जित संगदोषा,    अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः
                            द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदु:खसंज्ञैर ,गच्छ्न्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् 


श्लोक की टाइपिंग में हुई त्रुटि के लिए क्षमा चाहूँगा.उपरोक्त श्लोक में 'गच्छ्न्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्' के द्वारा  अमूढ़ (मूढता का सर्वथा त्याग करते  हुए)होकर 'अव्यय पद' तक पहुँचने  की साधना वर्णित  है,जिसकी व्याख्या निम्न प्रकार से की जा सकती  है.


निर्मान्-   


पहली साधना है मान रहित होने की.जैसा कि हमने जाना कि हनुमान जी सदा मान रहित हैं.हमें भी अपने 
चंचल कपि रूप चित्त को हनुमान जी का ध्यान करते हुए मानरहित करने का प्रयास करते रहना  चाहिए.
अपने को मान देने की प्रक्रिया हमें लक्ष्य से भटका देती है.हम जिस भी इष्ट का ध्यान करते हैं,उसी के  हम में 
गुण भी आ जाते हैं.हनुमान जी का ध्यान करने से 'मान रहित' होने का गुण निश्चितरूप से हम में आ जाएगा,
मन में ऐसी आस्था और विश्वास रखकर हमें 'हनुमान जी' के  मानरहित स्वरूप का निरंतर चिंतन करना  चाहिये.


अमोहा -  


दूसरी साधना है मोह रहित होने की.अर्थात 'अमोहा' होने की. हनुमान जी 'ज्ञानिनामग्रगण्यम ' व 'बुद्धिमतां वरिष्ठम्'हैं.बालकाल में ही उन्होंने 'सूर्य' को मधुर फल जान कर भक्षण कर लिया था.'सूर्य' ज्ञान का प्रतीक है.सूर्य के भक्षण  का अर्थ है उन्होंने ज्ञान विज्ञान को बाल काल में ही पूर्णतया आत्मसात कर लिया था.जैसा की 'हनुमान लीला भाग -३' की पोस्ट में भी कहा गया था कि'समस्त अनिश्चिंतता,भय संदेह ,असुरक्षा का कारण 'मोह' अर्थात अज्ञान है' इसलिए  उस अव्यय पद यानि परमानन्द की स्थिति तक पहुँचने के लिए  'मोह' से निवृत्त हो जाना  भी अत्यंत आवश्यक है. इसके लिए हमें हनुमान जी का  'ज्ञानिनामग्रगण्यम ' व 'बुद्धिमतां वरिष्ठम्' रूप ध्यान में रख कर ज्ञान अर्जन की साधना निरंतर करते रहना चाहिये.


जित संग दोषा-  


संग दोष विषयों के संग व आसक्ति के कारण उत्पन्न होता है.श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय २, श्लोक ६२ में 
वर्णित है 'ध्यायतो विषयां पुंस: संगस्तेषूपजायते ...'. विषयों का ध्यान करने वाले पुरुष का उन विषयों से संग अथवा विषयों से आसक्ति हो जाती है. जिस कारण उसके मन में  विषय की कामना उत्पन्न हो जाती हैं,कामना में विघ्न पड़ने पर क्रोध की  उत्पत्ति  होती है.क्रोध से मूढ़ भाव अर्थात अज्ञान की प्राप्ति होती है,मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है,जिससे बुद्धि अर्थात ज्ञान शक्ति का नाश हो जाता है.बुद्धि का नाश होने से पुरुष अपनी स्थिति से ही  गिर जाता है.अर्थात परम पद की ओर बढ़ने के बजाय वह पथ भ्रष्ट हो भटकाव की स्थिति में आ जाता है.इसलिए परम पद की यात्रा की  ओर अग्रसर होने में संग दोष को जीतना अतिआवश्यक है.हनुमान जी  'जितेन्द्रियं' व  'दनुजवनकृशानुं ' हैं अर्थात उन्होंने  अपनी  समस्त  इन्द्रियों पर विजय प्राप्त की हुई है उनमें 'समस्त विकारों,अधम वासनाओं को भस्म करने   की  सामर्थ्य है. वे  विषयों का ध्यान करने के बजाय सदा राम जी (परम पद ) का ही ध्यान करते हैं.विषयों के ध्यान से चित्त को हटा परमात्मा का ध्यान करने से धीरे धीरे 'संग दोष' पर विजय प्राप्त की जा सकती है.  




अध्यात्मनित्या-  


हम अधिकतर बाहरी जगत का चिंतन करते रहते है.अपने स्वरुप का चिंतन 'अध्यात्म' के नाम से जाना जाता है.आंतरिक चिंतन  अर्थात अपने स्वरुप का नित्य चिंतन करने से भी हम परम पद की ओर  अग्रसर होते हैं.जीवात्मा परमात्मा का अंश है  अर्थात वह भी सत्-चित-आनन्द स्वरुप ही  है. परन्तु,जीवात्मा के  मन,बुद्धि और इन्द्रियाँ ब्राह्य प्रकृति में अत्यंत व्यस्त हो जाने के कारण उसे अपने स्वरुप का ध्यान लोप हो जाता है.नित्य प्रति स्वयं के स्वरुप का साक्षी भाव से  चिंतन व ध्यान  करना ही 'अध्यात्मनित्या'  है.हनुमान जी 'अध्यात्म नित्या' के कारण ही' सकलगुणनिधानं  व   वानरणामधीशं हैं. 




उपरोक्त श्लोक में वर्णित  शेष तीन साधनाओं ( विनिवृत्तकामाः, द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदु:खसंज्ञैर  की व्याख्या मैं अपनी अगली पोस्ट में करूँगा.आशा है सभी  सुधि जन अपने अपने विचार उपरोक्त साधनाओं के सम्बन्ध में अवश्य प्रस्तुत करेंगें.


पिछले महीने अमेरिका के टूर पर गया हुआ था.इस कारण और अपनी व्यस्तता के कारण यह पोस्ट देर से लिख पाया हूँ.इसके लिए सभी जिज्ञासु सुधि जनों से  क्षमाप्रार्थी हूँ, विशेषकर उनका जिन्होंने मुझे हनुमान लीला पर पोस्ट लिखने के लिए बार बार प्रोत्साहित किया है.


अमेरिका में  वहाँ की एक विख्यात हिंदी चैनल  ITV  के लिए ITV  के Director श्री अशोक व्यास जी ने श्रीमती सरू सिंघल जी (ब्लॉग 'words')  और मुझे लेकर एक इंटरव्यू लिया था. उसका youtube लिंक है     http://youtu.be/IcWHN6UzHKI 


श्रीमती सरू सिंघल (Saru singhal) जी ने अपने ब्लॉग words पर ' "Discussion on Blogging on ITV Gold": एक पोस्ट भी लिखी है.


सुधिजन इन लिंक्स का अवलोकन कर सकते हैं.मुझे जब भी समय मिलेगा तो मैं भी अलग से पोस्ट लिखूंगा.
अभी आप अपने विचार 'Followers'  की ब्लॉग्गिंग में क्या महत्ता है पर भी प्रकट कर सकते हैं. 
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